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हो जाए न पथ में रात कहीं, मंजिल भी तो है दूर नहीं- यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है! दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

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प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित गीत ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!’ से ली गयी हैं। ये पंक्तियाँ हरिवंश राय बच्चन द्वारा रचित गीत ‘निशानिमंत्रण’ से उद्धृत हैं।

इन पंक्तियों में कवि जीवन यात्रा को पथ कह कर संबोधित कर रहे हैं। जिस प्रकार सूर्योदय के बाद सूर्यास्त निश्चित है उसी प्रकार जन्म के बाद मृत्यु निश्चित है, हर क्षण जीवन ढलता जा रहा है। इस जीवन यात्रा में यात्री दिन ढलने के पहले अपने गंतव्य तक पहुंचना चाहता है। अर्थात सारी सुख सुविधाएं और जिम्मेदारियाँ पूरी कर लेना चाहता है। ठीक वैसे ही जैसे एक पंछी दिन ढलने से पहले अपने घोंसले तक लौट आना चाहता है। 



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