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हस्ती चढ़िए ज्ञान को, सहज दुलीचा डारि।स्वान रूप संसार है, पूँकन दे झख मारि ।भावार्थ : कबीर कहते हैं कि तुम ज्ञानरूपी हाथी पर सहजरूपी कालीन बिछाकर अपने मार्ग पर निश्चित होकर चलते रहो। यह संसार कुत्ते के समान है जो हाथी को चलते देखकर अकारण भौंकता रहता है। कहने का आशय है कि ज्ञान-प्राप्ति में लीन साधक को देखकर संसार के लोग उसकी निंदा करते रहते हैं, परन्तु उसे संसारवालों की निंदा की परवाह नहीं करनी चाहिए।1. संसार को किस तरह बताया गया है ?2. ज्ञान-प्राप्ति के मार्ग में कबीर ने किसे आवश्यक माना है ?3. अंतिम पंक्ति में कबीर क्या कहते हैं ?4. कबीर ने ज्ञान-प्राप्ति का क्या उपाय बताया है ?5. दो तत्सम शब्द ढूँढकर लिखिए।

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1. संसार को कुत्ते के समान बताया गया है, जो अकारण किसी की निंदा करता रहता है।

2. ज्ञान-प्राप्ति के मार्ग में कबीर ने सहजता को आवश्यक माना है।

3. अंतिम पंक्ति में कबीर कहते हैं कि साधक को लोगों की निंदा की परवाह किए बिना ज्ञान-प्राप्ति के मार्ग पर आगे बढ़ते रहना चाहिए।

4. कबीर ज्ञान-प्राप्ति का उपाय बताते हुए कहते हैं कि साधक को ज्ञानरूपी हाथी की सवारी सहजता रूपी कालीन बिछाकर करनी चाहिए। कभी किसी की निंदा की परवाह नहीं करना चाहिए।

5. तत्सम शब्द – (1) हस्ती (2) ज्ञान



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