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‘झूठ शब्दों में निहित नहीं है. छल करने में है। चुप्पी साधकर भी झूठ बोला जा सकता है।’

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आम तौर पर खुलकर साफ-साफ शब्दों में किसी सच बात को उसके विपरीत रूप में बनाकर कहना या पेश करना झूठ कहलाता . है। इसके अतिरिक्त झूठ के अन्य रूप भी हैं और ये साफ-साफ शब्दों। में झूठ बोलने से कहीं अधिक बुरे होते हैं। ये झूठ छल-कपट के रूप। में होते हैं।

ऐसे मामलों में किसी सच बात को सच न कहकर उस पर चुप्पी साधकर, दोहरे अर्थवाले शब्दों का प्रयोगकर, किसी शब्दांश पर विशेष ओर देकर, आँख से संकेतकर तथा किसी वाक्य को विशेष महत्त्व आदि देकर झूठ का प्रयोग होता है। इस प्रकार की हरकतों का गूढ अर्थ अथवा आशय साधारणतः प्रत्यक्ष रूप में नहीं खुलता, पर वास्तव में यह बहुत महत्त्व रखता है। इस प्रकार का झूठा प्रयोग बहुत भयानक होता है और इसके पीछे झूठ बोलनेवाले की बुरी नीयत होती है।



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