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काबा फिरि कासी भया, रामहिं भया रहीम।मोट चून मैदा भया, बैठि कबीरा जीम ।भावार्थ : कबीर चाहते है कि जब तक मुझे ज्ञान नहीं था, तब तक मैं अज्ञानियों की तरह धर्म-जाति आदि के भेद से ग्रसित था। ज्ञान-प्राप्ति के बाद मैं राम-रहीम, हिन्दु-मुसलमान के भेद से ऊपर उठ गया हूँ। अब मेरे लिए काबा और काशी में कोई अंतर नहीं रह गया। मन की बुराइयों के कारण जिसे मोटा आटा समझता था, अब वह मैदा हो गया है, जिसे में आराम से खा रहा हूँ अर्थात् अब उनके मन में किसी प्रकार का भेद नहीं रह गया है।1. ‘काबा फिर कासी भया’ का आशय बताइए।2. ‘रामहिं भया रहीम’ का भाव क्या है ?3. कबीर के मन से धार्मिक भेदभाव मिटने से क्या परिवर्तन हुआ ?4. कबीर ने दोहे के माध्यम से क्या संदेश दिया है ? |
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Answer» 1. ‘काबा फिर कासी भया’ का आशय यह है कि मन में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं रह गया। 2. ‘रामहि भया रहीम’ का भाव यह है कि मेरी धर्माधता मिट गई है। अब मेरे लिए राम-रहीम एक ही हैं। 3. कबीर के मन से धार्मिक भेदभाव मिट जाने के बाद उनकी धर्मांधता समाप्त हो गई। अब उनके लिए राम-रहीम, काबा काशी में कोई अंतर नहीं रह गया। वे बड़ी सहजता के साथ जीवन जी रहे हैं। 4. कबीर का संदेश है कि हमें कट्टर या धर्माध नहीं होना चाहिए। राम-रहीम में कोई भेद नहीं है। |
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