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‘कानों में प्राणों की कहती’ से कवि का क्या तात्पर्य है?

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जब सौरभ वसना समीर कानों के निकट से गुजरती है, वह मानो कानों में प्राणों को पुलकित करनेवाला प्रेम मन्त्र चुपचाप कह जाती है।



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