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काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ-दिल में एक चुभन सी थी, यह दुनिया अलबेली थी।मन में एक पहेली थी, मैं सबके बीच अकेली थी।मिला, खोजती थी जिसको, हे बचपन! ठगा दिया तूने।अरे! जवानी के फंदे में, मुझको हँसा दिया तूने॥माना, मैंने, युवाकाल का जीवन खूब निराला है।आकांक्षा, पुरुषार्थ, ज्ञान का उदय मोहने वाला है।

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कठिन शब्दार्थ-चुभन-सी = मधुर कसक। अलबेली = अनौखी, सजी-धजी। पहेली = प्रश्न, उत्सुकता। अकेली = मन की भावना व्यक्त न कर पा रही। ठगा दिया = जवानी को सौंप दिया। जवानी का फंदा = युवावस्था की मुधर अनुभूतियाँ। आकांक्षा = इच्छा। पुरुषार्थ = पराक्रम, सामर्थ्य। उदय = उत्पन्न होना॥

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवियत्री सुभ्रद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘मेरा नय बचपन’ से लिया गया है। कवियत्री ने रस अंश में युवावस्था आने पर, मन में उठने वाली मधुर भावनाओं के प्रकट किया है।

व्याख्या-कवयित्री कहती है कि जवानी में प्रवेश करते ही उसकी मनोभावनाएँ बदलने लगीं। उसके मन में एक मधुर कसक सी उठने लगी। जवानी की वह दुनिया बड़ी अनौखी और आकर्षक थी। उसके मन में जीवन को लेकर अनेक प्रश्न और उत्सुकताएँ जागने लगीं। उसे लगने लगा जैसे इतने प्रियजनों और परिजनों के बीच रहते हुए भी उसे ऐसा कोई विश्वस्त साथी नहीं मिल रहा था जिससे वह अपनी मनोभावनाओं को साझा कर सके। कवयित्री कहती है वह मन ही मन जिससे मिलने को उत्सुक थी वह यौवन उसे मिला तो सही पर उसे लगा कि बचपन ने उससे छल किया था। उसने उसे जवानी के मधुर जाल में उलझा दिया। यह ठीक है कि जवानी का समय बड़ा अनौखा होता है। इस आयु में व्यक्ति के मन में अनेक कामनाएँ जागा करती हैं। उसमें नई सामर्थ्य उत्पन्न होती है और ज्ञान में भी वृद्धि होती है। जवानी का यह समय सचमुच बड़ा मनमुग्धकारी होता है॥

विशेष-
(i) किशोरावस्था से जवानी में प्रवेश करते समय युवा हृदयों में जो भावनाएँ और अनुभूतियाँ जागा करती हैं, कवयित्री ने उनका चित्रण मन-मोहक भाषा-शैली में किया है।
(ii) बचपन के भोले-भाले जीवन की देहली लाँध कर जब मन, जवानी के प्रांगण में प्रवेश करता है तो इतनी मधुर अनुभूतियों और उत्सुकताएँ जागती हैं कि युवा को लगता है उसे ठग लिया गया है। कवयित्री ने इसी ओर संकेत किया है।
(iii) भाषा सरल है। वर्णन-शैली भावुकता प्रधान है।
(iv) ‘जवानी के फंदे’ में रूपक तथा ‘माना मैंने’ में अनुप्रास अलंकार है।



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