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काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ।कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना?नादान वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना!फिर मूढ़ न क्या जग, जो इस पर भी सीखे?मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भुलाना!

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कठिन शब्दार्थ–यत्न = उपाय। मिटे = मिट गए, संसार से चले गए। नादान = अज्ञानी । दाना = बुद्धिमान, ज्ञानी । मूढ़ = मूर्ख। सीखे = ज्ञान पाने का यत्न करे। सीख रहा = प्रयत्न कर रहा हूँ॥

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता ‘आत्म-परिचय’ से लिया गया है। इस अंश में कवि सत्य की खोज में लगे लोगों को नादान बताते हुए, ज्ञान के अहंकार से मुक्त होने का संदेश दे रहा है।

व्याख्या- कवि कहता है कि संसार में सभी लोग परम सत्य की खोज में लगे हैं परन्तु उनके नानाविध प्रयत्न सफल नहीं होते और वे थक-हारकर बैठ जाते हैं या फिर यत्न करते-करते ही संसार से चले जाते हैं। सांसारिक बातों को जानकर ही लोग स्वयं को ज्ञान सम्पन्न समझते हैं। परन्तु वास्तव में वे अज्ञानी ही हैं। सच्चे ज्ञान के अभाव में सत्य का साक्षात्कार नहीं हो सकता, इस बात को जानकर भी वे अनजान बने रहते हैं। इतने पर भी लोग सांसारिक ज्ञान को सीखने में लगे हुए हैं। ऐसे लोगों को मूर्ख ही कहा जा सकता है। यह जानने के बाद मैंने जो कुछ अब तक सीखा है, उसे भुलाने की चेष्टा कर रहा हूँ।

विशेष-
(i) कवि ने संसार को मूढ़ कहा है। सत्य का साक्षात्कार सच्चे ज्ञान के बिना संभव नहीं है, परंतु यह संसार के लोग सांसारिक ज्ञान में फंसे रहकर भी सत्य को पाने के सपने देखते हैं।
(ii) ‘दाना’ शब्द नादान का विपरीतार्थक शब्द है। नादान नासमझ व्यक्ति को कहा जाता है और दाना बुद्धिमान को।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश की भाषा सरल एवं भावानुकूल है। कवि ने तत्सम शब्दावलीयुक्त खड़ी बोली का प्रयोग किया है। गीत छंद का प्रयोग हुआ है। कवि ने लय और तुक का ध्यान रखा है।
(iv) उपर्युक्त काव्यांश में ‘कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना?’ में प्रश्नालंकार का प्रयोग हुआ है। साथ ही विरोधाभास अलंकार का प्रयोग भी है।



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