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काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ।मैं और, और जगे और, कहाँ का नाता,मैं बना-बना कितने जग रोज मिटाता,जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभवमैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता!

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कठिन शब्दार्थ- और = भिन्न, अलग। नाता = संबंध बना-बना = कल्पना कर-कर के। मिटाता = त्याग देता, भुला देता॥ जोड़ा करता = इकट्ठा किया करता है। वैभव = संपत्ति । प्रति = प्रत्येक। पग = पैर। ठुकराता = ठोकर मारता॥

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि हरिवंशराय बच्चन की कविता ‘आत्म-परिचय’ से लिया गया है। कपि अपना तथा संसार का लक्ष्य अलग-अलग बता रहा है। उसे सांसारिक वैभव से कोई लगाव नहीं है।

व्याख्या-कवि कहता है कि इस संसार से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। उसके और संसार के लक्ष्य अलग-अलग हैं। कवि सत्य की खोज के लिए आध्यात्मिक ज्ञान को पाने में लगा है और यह संसार भौतिक सुख-सुविधाओं के संग्रह में लीन है। कवि होने के नाते वह अपनी कल्पना में अनेक लोकों का निर्माण करता है और अनुपयुक्त देखकर उनको मिटा देता है।
संसार के लोग दिन-रात जिस धरती पर धन-संपत्ति जोड़ने में लगे रहते हैं, उस भौतिक सुखों से पूर्ण धरती से उसे कोई लगाव नहीं है। वह इस वैभव के भूखे सांसारिक जीवन को ठुकराकर सत्य और प्रेम के पथ पर चलते रहना चाहता है।

विशेष-
(i) कवि ने स्पष्ट कहा है कि उसके और इस भौतिक सुखों के संग्रह करने वाले सांसारिक जीवन के रास्ते अलग-अलग हैं। उसने वैभव को ठुकरा कर प्रेम और सत्य के ज्ञान का मार्ग चुन लिया है।
(ii) कवि को जगत की चिन्ता नहीं है। वह तो एक कल्पनाशील कवि होने के कारण नित्य ही नए-नए संसार रचा करता और मिटाया करता है।
(iii) काव्यांश में कवि ने सांसारिक विषयों में अपनी अरुचि का और आध्यात्मिक चिंतन के प्रति आकर्षण का संकेत किया है।
(iv) सरल भाषा में गहन-गम्भीर भावों को व्यक्त किया है।
(v) ‘और’ तथा ‘और’ के अर्थ भिन्न होने के कारण यमक अलंकार है।



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