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काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ।मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,हो जिस पर भूपों के प्रासाद निछावर,मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ।

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कठिन-शब्दार्थ- रोदन = रोना। राग = संगीत शीतल = सुनने में मधुर लगने वाली। वाणी = कविता, बोली। आग = मन की व्यथा। भूप = राजा । प्रासाद = राज-भवन, महल। खंडहर = टूटा हुआ भवन।

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि हरिवंशराय बच्चन की कविता ‘आत्म-परिचय’ से लिया गया है। कवि परस्पर विरोधी कथनों के द्वारा अपनी मनोभावनाओं से परिचित करा रहा है।

व्याख्या-कवि इसी कविता में कह चुका है कि वह किसी अज्ञात प्रिय की याद अपने हृदय में छिपाए जी रहा है। उस प्रियतम (परमेश्वर) के वियोग में व्याकुल कवि का हृदय जब रोता है, तो उसका वह रुदन कवि के गीतों के रूप में सबके सामने प्रकट हो जाता है। कवि के ये गीत सुनने में शीतल और मधुर होते हैं, किन्तु इनके भीतर उसकी विरह व्यथा भी अलग दहकती रहती है। कवि फिर भी अपने खंडहर जैसे जीवन से संतुष्ट है। वह अपने इस जीवन के सामने राजभवनों के सुखों को भी तुच्छ समझता है। वह प्रिय की स्मृतियों से जुड़े, भग्न-भवन जैसे जीवन को संतुष्ट भाव से जिए जा रहा है।

विशेष-
(i) कवि के रुदन में संगीत छिपा है। उसकी शीतल वाणी में आग छिपी है। वह अपने जीवनरूपी खंडहर के एक छोटे से भाग पर राजाओं के महल न्यौछावर कर सकता है। लगता है कवि का हृदय विरोधाभासों का निवास है।
(ii) अपनी कोमल और अति संवेदनशील भावनाएँ, कवि ने अपने सटीक शब्द-चयन से व्यक्त कर दी हैं।
(iii) भाषा सशक्त है। विरोधाभासी शैली मन को चकित करती है।
(iv) काव्यांश में विरोधाभास अलंकार है।
(v) छायावादी झलक काव्यांश में आकर्षण उत्पन्न कर रही है।



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