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काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ।मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ,मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ,है यह अपूर्ण संसार न मुझको भाता,मैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ।मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ,सुख-दुख दोनों में मग्न रहा करता हूँ;जग भव-सागर तरने को नावे बनाए,मैं भव मौजों पर मस्त बहा करता हूँ। |
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Answer» कठिन शब्दार्थ- निज = अपने। उर = हृदय। उद्गार = भावनाएँ, विचार। उपहार = प्रेमभाव, सद्भावनाएँ। अपूर्ण = अधूरा, मधुर भावनाओं से रहित। न भाता = अच्छा नहीं लगता। स्वप्नों का संसार = मन को सुहाने वाली भावनाएँ। जला हृदय में अग्नि = सांसारिक दुखों से त्रस्त मन। दहा करता हूँ = दुखी हुआ करता हूँ। मग्न = एक भाव से, अप्रभावित। भव-सागर = संसार रूपी सागर, जन्म-मरण का चक्र। तरने को = उद्धार पाने को। नाव = पुण्य कार्य। भव मौजों पर = सांसारिक जीवन की मस्ती॥ संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। इसे अंश में कवि कह रहा है कि वह अपनी कविता द्वारा सभी के कल्याण की कामना करता रहता है। वह अपने सपनों के संसार में मग्न रहता है, वह सुख-दुख को समान भाव से ग्रहण करते हुए मस्ती के साथ जीवन बिताया करता है। व्याख्या-कवि कहता है कि मैं अपने हृदय के भावों को अपनी कविता द्वारा व्यक्त करता रहता हूँ। मेरी कविता में सारे संसार के कल्याण की कामना रहती है। यही संसार को मेरा प्रेम-उपहार है। मेरी दृष्टि में यह संसार अधूरा है, जो मुझे प्रिय नहीं है। इसीलिए मैं अपने सपनों के संसार में मग्न रहता हूँ जहाँ कोई चिन्ता और अभाव नहीं है। यद्यपि संसार के कष्ट, अभाव और दुख-दर्द उसके मन को निरन्तर जलाते हैं, परन्तु उसके लिए सुख-दुख दोनों समान हैं। लोग इस संसार को माया और भ्रम मानकर इस संसाररूपी सागार से पार होने के उपाय किया करते हैं। वे पुण्य-कार्यों को नाव बनाकर संसार से मुक्ति चाहा करते हैं लेकिन कवि मस्ती के साथ संसार-सागर की लहरों पर बहता रहता है। आशय यह है कि कवि संसार की कठिनाइयों से विचलित न होकर प्रसन्नतापूर्वक उनके बीच से होकर अपनी मार्ग तलाशता है। विशेष- |
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