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काव्यांशों की सप्रसंगै व्याख्याएँ।बहुत काली सिल जरा से लाल केसर सेकि जैसे धुल गई होस्लेट पर या लाल खड़िया चाकमल दी हो किसी ने

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कठिन शब्दार्थ- सिल = मसाले, चटनी आदि पीसने के लिए प्रयुक्त होने वाला पत्थर का टुकड़ा। केसर = कश्मीर में पैदा होने वाला लाल-पीले रंग का एक पुष्प। स्लेट = हेलके काले पत्थर की चौकोर पतली प्लेट, जिस पर चाक या खड़िया से लिखा जाता है। खड़िया = सफेद रंग की मिट्टी का टुकड़ा जिससे बोर्ड या स्लेट पर लिखी जाता है। चाक = खड़िया, खड़िया से बनाई गई लिखने की बत्ती।

संदर्भ तथा प्रसंग- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि शमशेर बहादुर सिंह की कविता ‘उषा’ से लिया गया है। कवि अनूठे उपमानों से प्रात:काल के आकाश के शब्द-चित्र प्रस्तुत कर रहा है।

व्याख्या-कवि कहता है गहरे नीले या काले आकाश में उषाकालीन लालिमा ऐसी लग रही है मानो कोई बहुत काली सिल लाल केसर मिले पानी से धो दी गई हो अथवा किसी ने लाल रंग की खड़िया या चाक को स्लेट पर मल दिया हो।

विशेष-
(i) आकाश के लिए ‘काली सिल’ तथा ‘स्लेट’ अनूठे और सटीक उपमान हैं। नीले आकाश में उषा की हल्की लालिमा के दृश्य को अंकित करने के लिए ‘लाल केसर से धुला होना’ तथा स्लेट पर ‘लाल खड़िया मला होना भी जाने-पहचाने घरेलू बिम्ब हैं।
(ii) भाषा सरल है और वर्णन शैली बिम्ब अंकित करने वाली है।
(iii) आकाश में बहुत काली ………………… धुल गई हो’ तथा ‘स्लेट पर ……………किसी ने अंशों में उत्प्रेक्षा तथा संदेह अलंकार भी है।
(iv) काव्यांश में प्रयोगवादी काव्य की झलक है।



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