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कायर मत बन कविता का भावार्थ :

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1) कुछ भी बन बस कायर मत बन।
ठोकर मार पटक मत माथा,
तेरी राह रोकते पाहन।
कुछ भी बन बस कायर मत बन।

कवि मनुष्य को सम्बोधित कर रहा है कि हे मानव! तुम सब कुछ बनो, किन्तु डरपोक मत बनो। मार्ग में यदि पत्थर भी तुम्हारे मार्ग को रोकते हैं, तो ठोकर मार उन्हें वहाँ से हटा दो; किन्तु उनके समक्ष झुको नहीं। माथा पटकना पाप है। अर्थात् जीवन में आने वाली कठिनाइयों से निराश होना व्यर्थ है।

2) ले-देकर जीना क्या जीना?
कब तक गम के आँसू पीना?
मानवता ने सींचा तुझको
बहा युगों तक खून-पसीना।
कुछ न करेगा? किया करेगा….
रे मनुष्य-बस कातर क्रंदन?
कुछ भी बन बस कायर मत बन।

कवि कह रहा है कि हे मानव! कलह कर जीना अच्छा नहीं है। इस तरह तुम दुःख के आँसू कब तक बहाते रहोगे? मनुष्यता ने तो बहुत समय तक अपना खून और पसीना बहाकर तुम्हें बढ़ाया है या तो तू कुछ नहीं करेगा? या फिर बस कायर की 

2) ले-देकर जीना क्या जीना?
कब तक गम के आँसू पीना?
मानवता ने सींचा तुझको
बहा युगों तक खून-पसीना।
कुछ न करेगा? किया करेगा….
रे मनुष्य-बस कातर क्रंदन?
कुछ भी बन बस कायर मत बन।

कवि कह रहा है कि हे मानव! कलह कर जीना अच्छा नहीं है। इस तरह तुम दुःख के आँसू कब तक बहाते रहोगे? मनुष्यता ने तो बहुत समय तक अपना खून और पसीना बहाकर तुम्हें बढ़ाया है या तो तू कुछ नहीं करेगा? या फिर बस कायर की 

2) ले-देकर जीना क्या जीना?
कब तक गम के आँसू पीना?
मानवता ने सींचा तुझको
बहा युगों तक खून-पसीना।
कुछ न करेगा? किया करेगा….
रे मनुष्य-बस कातर क्रंदन?
कुछ भी बन बस कायर मत बन।

कवि कह रहा है कि हे मानव! कलह कर जीना अच्छा नहीं है। इस तरह तुम दुःख के आँसू कब तक बहाते रहोगे? मनुष्यता ने तो बहुत समय तक अपना खून और पसीना बहाकर तुम्हें बढ़ाया है या तो तू कुछ नहीं करेगा? या फिर बस कायर की तरह बैठा-बैठा अपनी कमजोरी पर रोता रहेगा। तुम कुछ भी बनो किन्तु कायर मत बनो।

3) युद्धं देहि कहे जब पामर
दे न दुहाई पीठ फेर कर;
या तो जीत प्रीति के बल पर
या तेरा पद चूमे तस्कर।
प्रतिहिंसा भी दुर्बलता है,
पर कायरता अधिक अपावन
कुछ भी बन बस कायर मत बन।

हे मानव! जब तुम्हें कोई युद्ध के लिए ललकारे तो पीठ फेरकर सहायता मत माँग। हे मानव! प्रेम के आधार पर प्राप्त विजय को तुम्हारा रास्ता चूमना चाहिए। क्या तुम यह नहीं जानते हो कि . बदला लेना भी अच्छा कार्य नहीं है। कायरता तो इससे भी अधिक गिरी हुई वस्तु है। इसलिए तुम सब कुछ बनो, किन्तु कायर मत बनो।

4) तेरी रक्षा का न मोल है,
पर तेरा मानव अमोल है,
यह मिटता है, वह बनता है,
यही सत्य की सही तोल है,
अर्पण कर सर्वस्व मनुज को,
कर न दुष्ट को आत्मसमर्पण,
कुछ भी बन बस कायर मत बन।

हे मनुष्य! तेरी रक्षा हो, इसका कोई मूल्य नहीं है। पर यह बात कटु सत्य है कि मानवता एक बहुमूल्य वस्तु है। जब मनुष्य अपने को मिटा देता है, तभी मानवता की रक्षा होती है। सत्य का यही मापदंड है। तुम मनुष्य के लिए अपना सब कुछ त्याग दो, किन्तु दुष्ट के सामने कभी मत झुको। तुम सब कुछ बनो, किन्तु कायर मत बनो।



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