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कबीर की भक्ति भावना पर विचार कीजिए​

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पाथर पूजै हरी मिलै, तो मैं पूजूँ पहार । ताते तो चक्की भली, पीसि खाय संसार॥'' वह समाज को एक सूत्र में बांधने का प्रयास करते थे। उनका भक्ति मार्ग अत्यंत सरल है वह ईश्वर को मंदिर , मस्जिद में नहीं बल्कि अपने मन में ढूंढ़ने बोलते थे।



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