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कदम मिलाकर चलन में कौन सी कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती है?

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कदम मिलाकर चलने में प्रलय की-सी घोर घटाओं में आगे बढ़ना पड़ता है। पाँव के नीचे तेज धूप अंगारों की तरह लगती है। पहाड़ जैसी विपत्तियों का सामना करना पड़ता है। अपने मान-सम्मान का भेद भूलना पड़ता है। घोर घृणा और पवित्र प्रेम का अंतर विस्मृते करना पड़ता है। अपने अरमानों की कुर्बानी देनी पड़ती है। इस प्रकार कदम मिलाकर चलने में तरह-तरह की कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती हैं।



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