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खिलाफत आन्दोलन से आप क्या समझते हो? इसका भारत की राजनीति में क्या महत्व है?

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खिलाफत आन्दोलन- खिलाफत आन्दोलन भारतीय मुसलमानों का मित्र राष्ट्रों के विरुद्ध विशेषकर ब्रिटेन के खिलाफ तुर्की के खलीफा के समर्थन में आन्दोलन था। तुर्की का खलीफा समूचे विश्व में सुन्नी मुसलमानों का धर्म गुरु माना जाता था। प्रथम महायुद्ध (1914-1918 ई०) में तुर्की अंग्रेजों के विरुद्ध जर्मनी के पक्ष में था। जर्मनी की पराजय से तुर्की की पराजय जुड़ी हुई थी। युद्ध के अन्त में तुर्की साम्राज्य को मित्र देशों ने आपस में बाँट लिया। इस तरह तुर्की साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया। इससे भारतीय मुसलमान बहुत क्षुब्ध हो गये। यहाँ खिलाफत आन्दोलन का मुख्य कारण था।।
उद्देश्य और कार्य- खिलाफत आन्दोलन का उद्देश्य खलीफा की शक्ति को पुनः स्थापित करना था। इस समय भारत में राष्ट्रीय एकता का वातावरण था। लखनऊ समझौते में लीग और कांग्रेस बहुत निकट आ गयी थीं। लीग पर राष्ट्रवादी मुसलमानों का वर्चस्व था। जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड में हिन्दुओं और मुसलमानों पर समान रूप से अत्याचार हुए थे। अतः राष्ट्रवादी मुसलमान अली बन्धु, मौलाना आजाद, हकीम अजमल खाँ तथा हजरत मोहानी के नेतृत्व में खिलाफत कमेटी बनाई गई। अखिल भारतीय खिलाफत कांग्रेस नवम्बर, 1919 ई० को दिल्ली में बुलाई गई। गाँधी जी इसमें शामिल हुए। लोकमान्य तिलक और गाँधी दोनों ही हिन्दू-मुसलमानों की एकता के लिए इस आन्दोलन को आवश्यक समझते थे।
गाँधी जी के शब्दों में “खिलाफत आन्दोलन हिन्दुओं और मुसलमानों को एकता के सूत्र में बाँधने का अवसर है, जो हमें 100 वर्षों तक नहीं मिलने वाला है।” उन्होंने 1920 ई० में यह भी घोषणा कर दी कि ‘‘खिलाफत का प्रश्न संवैधानिक सुधारों से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है’ मार्च, 1920 ई० को विधिवत खिलाफत कमेटी ने असहयोग आन्दोलन की घोषणा कर दी। सर्वप्रथम गाँधी जी इसमें शामिल हुए और युद्धकाल की सेवा के उपलक्ष्य में मिली ‘केसर-ए-हिन्द’ की उपाधि लौटा दी। नवम्बर, 1919 ई० में गाँधी जी खिलाफत कमेटी के अध्यक्ष चुने गए। सर्वत्र स्कूलों तथा कॉलेजों का बहिष्कार हुआ। शान्तिपूर्ण प्रदर्शन हुए जिसमें महिलाओं और बच्चों ने भाग लिया।

असहयोग और खिलाफत आन्दोलन साथ-साथ चले परन्तु असहयोग आन्दोलन के बढ़ते प्रभाव से खिलाफत आन्दोलन उसके सामने दब गया। उधर तुर्की में मुस्तफा कमाल पाशा द्वारा खलीफा के पद को समाप्त करने के साथ ही खिलाफत का प्रश्न भी समाप्त हो गया।

इस आन्दोलन के सम्बन्ध में आलोचकों ने खिलाफत आन्दोलन को राष्ट्रीय आन्दोलन से जोड़ने के गाँधी जी के प्रयासों को एक राजनीतिक भूल मानी है, परन्तु खिलाफत आन्दोलन ने थोड़े समय के लिए ही सही, हिन्दू-मुस्लिम एकता की भावना को सुदृढ़ किया। खिलाफत आन्दोलन ने उदार राष्ट्रवादी मुसलमानों को राष्ट्रीय संग्राम में शरीक होने का मौका दिया तथा इसने असहयोगा आन्दोलन के लिए पृष्ठभूमि तैयार कर दी।



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