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“खरा गोस्वामी ही इस पानी पर बिना पैर भिगोए चल सकता है।” तुलसी के इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» राजा ने तुलसी से कहा था कि तुम्हारी जिवा में भगवान जी स्वाद लेते हैं। गोसाई दुनिया का हर भोग राजी होकर ग्रहण करते हैं पर अपने स्वाद और सुख को वे भगवान का मानकर ही चलते हैं। तुलसीदास ने राजा के इस कथन के उत्तर में यह बात कही है। इसका आशय यह है कि जो भगवान का सच्चा भक्त है वही अपने स्वाद और सुख को भगवान का मानकर चल सकता है, जिसमें सच्ची भक्ति नहीं है वह अपने स्वाद को और सुख को भगवान में नहीं देख सकता। इसके लिए सच्ची साधना की आवश्यकता है, जिसने अपने आपको प्रभु के चरणों में समर्पित कर दिया है वही अपना स्वाद और सुख भगवान का मानकर चल सकता है। इसके लिए पूर्ण समर्पण की आवश्यकता है, जिसने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया है और प्रभुमय हो गया है वही इस आनन्द को ले सकता है। उनके लिए हर वस्तु भगवान की वस्तु है। हर स्वाद भगवान का स्वाद है। |
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