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ख्याति का स्वरूप समझाइए ।

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सामान्यतः ख्याति के स्वरूप का आधार धंधे के विक्रय पर आधारित रहा हुआ होता है। अगर धंधे का कंपनी स्वरूप में संयोजन (मिलान) किया जाये तब ख्याति के मूल्यांकन की आवश्यकता उत्पन्न होती है। जब निजी धंधे का अन्य पेढी या कंपनी में संयोजन किया जाये तब ख्याति की किंमत उत्पन्न होगी ही ऐसा नहीं होता । प्रत्येक पेढी की लाभ कमाने की क्षमता अलग-अलग हो सकती है। साझेदारी पेढी के स्वरूप में-

  • वर्तमान साझेदारों के लाभ-हानि वितरण में परिवर्तन किया जाये तब ख्याति के मूल्यांकन की आवश्यकता उत्पन्न होती है।
  • नये साझेदार के प्रवेश के स्वरूप में ख्याति के मूल्यांकन की आवश्यकता उत्पन्न होती है।
  • पुराने साझेदारों में से किसी साझेदार की निवृत्ति के संयोग में नया स्वरूप होने से ख्याति के मूल्यांकन की आवश्यकता उत्पन्न होती है।
  • पुराने साझेदारों में से किसी साझेदार की मृत्यु होने से साझेदारी के स्वरूप में परिवर्तन होने से ख्याति के स्वरूप में परिवर्तन
    होता है।
    इस प्रकार विभिन्न परिस्थितियों में अगर पेढी के स्वरूप में परिवर्तन देखने को मिले तो साथ ही साथ ख्याति में भी परिवर्तन देखने को मिलता है।


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