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किसी परंपरागत गाँव एवं कारखाने (या कॉल सेंटर) में कार्य किस प्रकार नियोजित किया जाता है? 

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किसी परंपरागत गाँव में कार्यों को समयबद्ध रूप से नियोजित नहीं किया जाता है। यह निर्धारित तो होता है कि परिवार के किस सदस्य को क्या कार्य करना है परंतु समय पड़ने पर एक सदस्य का कार्य दूसरी सदस्य कर सकता है। इस दृष्टि से परंपरागत गाँव में कार्यों के निष्पादन में कठोर नियंत्रण नहीं पाया जाता है। व्यावसायिक विशेषीकरणका भी अभाव पाया जाता है तथा समय पड़ने पर एक ही व्यक्ति मालिक, श्रमिक, बढ़ई, लोहार आदि बन सकती है। कार्य के बदले निश्चित पारिश्रमिक अथवा मेहनताने का प्रावधान भी नहीं होता है। इसके विपरीत, कारखाने को एक आर्थिक कठोर नियंत्रण के रूप में देखा जाता है तथा माक्र्स जैसे विद्वान तो इसे दमनकारी मानते हैं। कारखानों में काम करने वालों के लिए निश्चित कार्य, समय की पाबंदी, कार्य करने के निश्चित घंटे, हफ्ते के दिन इत्यादि निर्धारित हो जाते हैं। साथ ही, कार्य के बदले निश्चित पारिश्रमिक का भी प्रावधान होता है। नियोक्ता एवं कर्मचारी दोनों के लिए समय अब धन है, यह व्यतीत नहीं होता बल्कि खर्च हो जाता है।



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