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कर्तव्य का अर्थ बताइए तथा उसका वर्गीकरण कीजिए। यानागरिकों के कर्तव्यों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट कीजिए कि लोकतन्त्र में किन कर्तव्यों पर अधिक बल देना चाहिए ? याएक आदर्श नागरिक के अधिकार तथा कर्तव्यों का विवेचन कीजिए।यानागरिकों के अधिकारों एवं कर्तव्य का संक्षेप में उल्लेख कीजिए। 

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कर्तव्य – भारतीय प्राचीन विचारकों ने अधिकार की अपेक्षा कर्तव्यपालन पर अधिक जोर दिया है। कौटिल्य ने कर्तव्य को स्वधर्म कहा है। कर्त्तव्य अंग्रेजी भाषा के शब्द ‘ड्यूटी’ (Duty) का हिन्दी अनुवाद है। ‘ड्यूटी’ शब्द की उत्पत्ति ‘Due’ से हुई है, जिसका अर्थ ‘उचित होता है। अतः कर्त्तव्य से तात्पर्य ऐसे कार्य से है जिसे कोई व्यक्ति स्वाभाविक, नैतिक तथा कानूनी दृष्टि से करने हेतु बाध्य हो। लैड के शब्दों में, “करना चाहिए की भावना ही कर्तव्य है।” राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के शब्दों में, “कर्त्तव्य अधिकार का सच्चा स्रोत है। यदि हम अपने कर्तव्यों का पालन करते रहें तो अधिकार हमसे दूर न रहेंगे।”
डॉ० जाकिर हुसैन के मतानुसार, “अपने दायित्वों एवं सेवाओं का सक्रिय इच्छा द्वारा निर्वाह करना ही कर्तव्य है।”
संक्षेप में, किसी विशेष कार्य के करने अथवा न करने के सम्बन्ध में व्यक्ति के उत्तरदायित्व को ही कर्तव्य कहा जा सकता है। अन्य शब्दों में, जिन कार्यों के सम्बन्ध में समाज एवं राज्य सामान्य रूप से व्यक्ति से यह आशा करते हैं कि उसे वे कार्य करने चाहिए, उन्हीं को व्यक्ति के कर्तव्य की संज्ञा दी जा सकती है।

कर्तव्यों का वर्गीकरण अथवा प्रकार
नागरिकों के कर्तव्यों का क्षेत्र अत्यधिक व्यापक है, क्योंकि उसको एक साथ अनेक प्रकार के कर्तव्यों का पालन करना पड़ता है। एक नागरिक के प्रमुख कर्तव्य निम्नलिखित हैं-
1. नैतिक कर्तव्य – नैतिक कर्तव्य उसे कहते हैं जिसका सम्बन्ध व्यक्ति की नैतिक भावना, अन्त:करण तथा उचित कार्य की प्रवृत्ति से होता है। वस्तुतः नैतिक कर्तव्य का सम्बन्ध व्यक्ति के अन्त:करण से होता है। इन कर्तव्यों को राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं होती। नागरिक के नैतिक कर्तव्य निम्नलिखित हैं
(i) परिवार के प्रति कर्तव्य – व्यक्ति, राज्य और समाज के विकास में कुटुम्ब का प्रमुख स्थान है। परिवार में ही मनुष्य को सर्वप्रथम शिक्षा मिलती है और उसमें नागरिक गुणों का बीजारोपण होता है। श्रेष्ठ नागरिक और स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए स्वस्थ परिवार का होना भी आवश्यक है। यह तभी सम्भव है जब नागरिक परिवार के अनुशासन और आचरण का पालन करे।
(ii) अपने प्रति कर्त्तव्य – राज्य या समाज अन्ततः नागरिकों को संगठन है। नागरिकों की उन्नति पर ही उसकी उन्नति निर्भर है। स्वस्थ, चरित्रवान, परिश्रमी तथा स्वावलम्बी नागरिक एक स्वस्थ समाज और राज्य का निर्माण कर सकते हैं। अत: प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह अपने विकास पर पूर्ण ध्यान दे। इसके लिए उसे स्वस्थ, संयमी, अनुशासनप्रिय, शिक्षित और परोपकारी होना चाहिए। यदि कोई नागरिक अपने शारीरिक और मानसिक विकास के प्रति उदास रहता है तो वह अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता।
(iii) ग्राम, नगर, जाति तथा समाज के प्रति कर्तव्य – परिवार के अतिरिक्त नागरिक को भी अपने ग्राम, नगर, जाति एवं समाज से भी सहायता मिलती है; अतः इन संगठनों के प्रति भी उसके कुछ कर्तव्य हैं। उसका कर्तव्य है कि इन संगठनों की उन्नति में सहायता पहुँचाये।

2. कानूनी कर्तव्य अथवा राज्य के प्रति कर्तव्य – ये नागरिक के वे कर्तव्य होते हैं जिन्हें राज्य निर्धारित करता है। नागरिक को इनका पालन अनिवार्य रूप से करना होता है। इनके उल्लंघन करने पर राज्य द्वारा दण्ड दिया जाता है। नागरिक के प्रमुख कानूनी कर्तव्य निम्नलिखित हैं-
(i) राज्य के प्रति निष्ठा – राज्य के प्रति निष्ठा और भक्ति की भावना नागरिक का प्रथम कर्तव्य होता है। उसे शत्रुओं से देश को बचाने के लिए देश के अन्दर शान्ति और सुव्यवस्था बनाये रखने में राज्य की सहायता करनी चाहिए। आपातकाल में अनिवार्य सैनिक सेवा इसी प्रकार के कर्तव्य का फल है।
(ii) कानूनों का पालन – कानून का निर्माण समाज के कल्याण के लिए होता है। अत: प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह राज्य-निर्मित नियमों का पालन करे। ऐसा करके वह राज्य के लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक सिद्ध होगा।
(iii) करों का भुगतान – शासन-संचालन और नागरिकों की उन्नति के लिए प्रत्येक राज्य को आर्थिक शक्ति की आवश्यकता होती है। इस आर्थिक शक्ति को प्राप्त करने के लिए राज्य विविध प्रकार के कर लगाता है। अतः प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह समय से सभी प्रकार के करों का भुगतान करे।
(iv) मत का उचित प्रयोग – लोकतन्त्र को चलाने के लिए जनता के प्रतिनिधियों की आवश्यकता होती है और उन प्रतिनिधियों पर ही देश का भविष्य निर्भर करता है। इसलिए नागरिकों का कर्तव्य है कि वे जनता के प्रतिनिधियों का चुनाव पर्याप्त सोच-समझकर करें। जाति, धर्म अथवा धन को मत का अधिकार नहीं बनाना चाहिए।
(v) सार्वजनिक पद ग्रहण करना – प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह सार्वजनिक पद ग्रहण करने के लिए सदैव तत्पर रहे, साथ ही समाज द्वारा सौंपे गये उत्तरदायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वाह करे।



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