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कवि अपने मित्र की जुदाई से कैसे व्याकुल हो रहा है? 

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कवि सरगु जी कहते हैं कि हे मेरे मीत! तुमसे बिछुड़कर इतने दिन हो गए हैं कि लग रहा है- युग बीत गए हैं। फिर भी मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूँ, जैसे पेड़-पौधे वर्षा की कामना करते हैं। सम्पूर्ण संसार किसी-न-किसी स्वार्थ में फँसा है, जब कि तुम एक हो जो निस्वार्थी हो।



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