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कवि का मन अपने ‘मुग्ध मीत’ के लिए कैसे झंकृत हो रहा है? 

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कवि का मन अपने मुग्ध मीत के लिए झंझा के समान, बारीश के समान झंकृत हो रहा है। क्योंकि कवि इस स्वार्थी संसार की वणिक वृति, रिश्तों में भी व्यापारी बुद्धि से भयग्रस्त है। इस स्वार्थी संसार में मुग्ध मीत ही निःस्वार्थी है।



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