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कविता का सरल अर्थ :ऋतु वसंत का ………. घिरते देखा है। |
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Answer» कवि सरोवर के तट के सुनहरे प्रभात का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वसंत का यह सुंदर सवेरा था। मंद-मंद शीतल हवा चल रही थी। बाल-सूर्य की कोमल-कोमल किरणें चारों ओर फैल रही थीं। उनका सुनहरा प्रकाश पर्वत-शिखरों पर पड़ रहा था। इसलिए ये शिखर सुनहरी आभा से चमक रहे थे। ये शिखर अगल-बगल ही थे। सुबह होते ही उन विरह-विवश चकवा-चकवी का क्रंदन बंद हो गया। चकवाचकवी को चिरकाल से रात्रि के समय एक-दूसरे से अलग रहने का शाप मिला हुआ है, इसलिए इन्हें पूरी रात एक-दूसरे से अलग रहकर विरह में बितानी पड़ती है। सुबह होने पर शाप का प्रभाव खत्म हुआ तो इस पक्षी जोड़े का विलाप भी खत्म हो गया। कवि कहते हैं कि फिर मैंने उस महान सरोवर के तट पर शैवालों की हरी मखमली दरी पर चकवा- चकवी का प्रणय कलह छिड़ते देखा था। मैंने पर्वत-शिखरों पर बादल को घिरते हुए देखा है। |
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