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कविता की प्रासंगिकता पर टिप्पणी लिखें। |
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Answer» अकाल और उसके बाद इस छोटी-सी कविता के चार पंक्तियों में अकाल का विवरण है और चार पंक्तियों उसके बाद का दृश्य। इन चार पंक्तियों में भी “कई दिनों तक” हर पंक्ति के शुरू में बार-बार दुहराया जाता है। इसके बाद बहुत थोड़े-से सरल शब्द बजते हैं जिसमें अकाल की कथा कही गई है। इस अकाल कथा की पहली चार पंक्तियों में मनुष्य कहीं नहीं है। बिंबों में चूल्हा-चक्की है, कानी कुतिया है, चूहे हैं और छिपकलियाँ हैं। अनाज नहीं है तो चूल्हा और चक्की तो उदास और उतरे हुए मुँह के होंगेहों गेही। कुतिया है वह भी कानी। क्योंकिक्यों गरीब घर की है। संपन्न घर के कुत्ते तो झबरे बालों वाले सुंदर कुत्ते होते हैं। रोटी की आस में चक्की के पास पड़े नहीं रहते। छिपकलियाँ भला क्यों भीतर परेशान हाल गश्त लगा रही है? क्योंकिक्यों वे तो दाल-रोटी खाती नहीं हैं, कीड़े खाती हैं। लेकिन जिस घर में भोजन नहीं है वहाँ तेल क्या होगा! लिहाजा रात को घर में दीया भी नहीं जलता होगा और कीड़े तो रात की रोशनी में आते हैं। दिन की रोशनी में नहीं आते। ऐसे में छिपकलियाँ भी भूख की मारी हैं। चूहे तो कुत्ते की तरह स्वामीभक्त होते नहीं।हीं शिकस्ता हाल चूहे उस घर में कर क्या रहे हैं? चूंकि अकाल पड़ा है, इसलिए गाँव के किसी घर में अन्न नहीं होगा। वरना चूहे वहाँ चले जाते। खेतों में तो अन्न होने का सवाल ही नहीं उठता! वरना हम जानते हैं कि चूहे खेतों से अन्न चुराकर अपने बिलों में घसीट ले जाते हैं। बाद की चार पंक्तियों में हर पंक्ति का अंत ‘कई दिनों के बाद’ से होता है। जो भी होता है हर पंक्ति में कई दिनों के बाद’ होता है। घर के भीतर दाने आते हैं। घर भर की आँखें चमक उठती हैं। अभी भोजन बना नहीं है। लेकिन अन्न की आहट ने ही आँखों में रोशनी भर दी है। उम्मीद इसी तरह रोशनी लाती है। फिर धुआँ उठता है छप्पर के ऊपर ! यानि चूल्हा जल गया है। यह धुआँ शुभ संकेत दे रहा है। और कौए अब अपने पंख खुजला रहे हैं। क्योंकिक्यों इन पंखों से वे बहुत तेज़ी से उठते हैं और किसी भी थाली में झपट्टा मारके अपने हिस्से की रोटी ले उठते हैं। . धुआँ देखकर वे भी उम्मीद से भर उठते हैं। कुत्ते, चूहे, छिपकलियाँ और कौए भी सामाजिक प्राणी हैं। वे बस्तियों में, घर में मनुष्यों के साथ ही रहना चाहते हैं। उजाड़ में नहीं। |
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