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क्या 1857 ई० का विद्रोह भारत को अंग्रेजों के आधिपत्य से मुक्त कराने का सच्चा प्रयास था? इस विप्लव के क्या परिणाम हुए?

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1857 ई० के विद्रोह में भाग लेने वाले सभी विद्रोहियों तथा जनसाधारण का एक ही लक्ष्य था- अंग्रेजों को भारत से निकालना। उनमें अंग्रेजों के विरुद्ध सर्वव्यापी रोष था। तत्कालीन साहित्य जो समाज का दर्पण माना जाता है, में भी अंग्रेज विरोधी भावनाएँ प्रदर्शित की गई थीं। इस प्रकार 1857 ई० के संघर्ष में नि:सन्देह जनभावना अंग्रेजों के विरुद्ध थी। विद्रोहियों को संगठित करने वाला एकमात्र तत्त्व विदेशी शासन को समाप्त करने की भावना थी। अत: इस बात में कोई सन्देह नहीं है कि 1857 ई० का विद्रोह शासन को समाप्त करने के लिए हुआ था।

1857 ई० के विद्रोह के परिणाम- 1857 ई० का विद्रोह भारतीय इतिहास में एक युग परिवर्तनकारी घटना थी। यद्यपि यह विद्रोह असफल रहा, किन्तु इसके परिणाम अभूतपूर्व, व्यापक और स्थायी सिद्ध हुए। डॉ० मजूमदार ने लिखा है कि “सन् 1857 ई० का महान् विस्फोट भारतीय शासन के स्वरूप और देश के भावी विकास में मौलिक परिवर्तन लाया।” इसके द्वारा संवैधानिक दृष्टि से मुगल साम्राज्य हमेशा के लिए समाप्त हो गया। भारत में एक शताब्दी से शासन करने वाली ईस्ट इण्डिया कम्पनी की भी समाप्ति हो गई। भारत में महारानी विक्टोरिया का सीधा शासन स्थापित हो गया। इसने भारतीय राजनीति, प्रशासन, सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था एवं राष्ट्रीय भावना को गहरे रूप से प्रभावित किया। इस सम्बन्ध में लॉर्ड क्रोमर ने कहा था, “काश कि अंग्रेज युवा पीढ़ी भारतीय विद्रोह के इतिहास को पढ़े, ध्यान दे, सीखे और मनन करे। इसमें बहुत-से पाठ और चेतावनियाँ निहित हैं।” इस क्रान्ति के प्रमुख परिणाम निम्नलिखित हैं

(i) महारानी विक्टोरिया का घोषणा – पत्र और कम्पनी शासन का अन्त- इस विद्रोह के परिणामस्वरूप महारानी विक्टोरिया के घोषणा-पत्र के अनुसार ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन का अन्त कर दिया गया और भारत के शासन को सीधे शाही ताज (क्राउन) के अन्तर्गत लिए जाने की घोषणा की गई। इसमें एक भारतीय राज्य सचिव का प्रावधान भी किया गया और उसकी सहायता के लिए 15 सदस्यों की सलाह समिति बनाई जानी थी, जिसमें से 8 सरकार द्वारा मनोनीत होने थे और शेष 7 कोर्ट ऑफ डायेक्टर्स द्वारा चुने जाने थे।

यह उद्घोषणा 1 नवम्बर, 1858 को इलाहाबाद में लॉर्ड कैनिंग द्वारा की गई। इस घोषणा के तहत लॉर्ड कैनिंग की भारत में पुनर्नियुक्ति कर उसे शासन का सर्वोच्च अधिकारी बनाया गया। अब उसे गवर्नर जनरल के साथ-साथ वायसराय भी कहा जाने लगा। इस घोषणा में ब्रिटिश साम्राज्यवाद का क्षेत्रीय विस्तार न करने का आश्वासन दिया गया। ब्रिटिश सरकार ने रियासतों के अधिकारों, सम्मानों व पदों के प्रति अपनी आस्था प्रकट की तथा गोद लेने की प्रथा को स्वीकार किया गया। महारानी के इस घोषणा-पत्र को भारतीय स्वतन्त्रता का मेग्नाकार्टा (अधिकार देने वाला मूल कानून) कहा जाता है। वास्तव में इस घोषणा से भारतीय जनजीवन को उन्नत करने में कोई लाभ न हुआ, बल्कि व्यवहार में सरकार की नीति आक्रामक, हिंसात्मक, तर्क-विरोधी और पक्षपातपूर्ण रही।

(ii) सेना का पुनर्गठन- अंग्रेजों की सेना में भारी संख्या में भारतीय थे। इन्हीं भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों के विरुद्ध क्रान्ति की थी। अतः अब अंग्रेजी सेना में भारतीय सैनिकों की संख्या भी कम कर दी गई तथा उनकी 77वीं रेजीमेन्ट भंग कर दी गई। विद्रोह से पहले यूरोपीय सैनिकों की संख्या जो 40,000 थी अब 65,000 कर दी गई और भारतीय सेना की संख्या जो पहले 2,38,000 थी अब 1,40,000 निश्चित कर दी गई। तोपखाने पर पूर्णतः अंग्रेजी नियन्त्रण कर दिया गया। भारतीय सैनिकों के पुनर्गठन में जातीयता एवं साम्प्रदायिकता आदि तत्वों को ध्यान में रखकर भारतीय रेजीमेन्टों को गोरखा, पठान, डोगरा, राजपूत, सिक्ख, मराठे आदि में बाँट दिया गया। इस सम्बन्ध में एक अंग्रेज अधिकारी का मत था कि, “भारत में ऐसी सेना होनी चाहिए जो वास्तव में भारतीय न हो।” भारतीयों को सूबेदार की रैंक से ऊपर कोई रैंक नहीं दिए जाने का भी निर्णय किया गया।

(iii) ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का जन्म- अंग्रेजों ने मुसलमानों के प्रति घृणा की नीति अपनाते हुए दिल्ली की जामा मस्जिद और फतेहपुर मस्जिद मुसलमानों की नमाज के लिए बन्द कर दी। मुसलमानों को राजनीतिक व आर्थिक लाभ के पदों से वंचित कर सेना, प्रशासनिक सेवाओं और दरबार से उनका वर्चस्व समाप्त कर दिया गया। इस बारे में लॉर्ड एलनबरो ने कहा था, “मैं इस विश्वास से आँखें नहीं मूंद सकता कि यह कौम (मुसलमान) मूलत: हमारी दुश्मन है। और इसलिए हमारी सच्ची नीति हिन्दुओं से मित्रता की है। इस प्रकार अंग्रेजों ने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का पालन कर दोनों जातियों में वैमनस्य पैदा कर दिया, जो राष्ट्रीय आन्दोलन में घातक सिद्ध हुई और जिसके अन्तिम परिणाम स्वरूप देश का विभाजन हुआ।

(iv) भारतीय रियासतों के प्रति पुरस्कार और दण्ड नीति- 1857 ई० के विद्रोह में ग्वालियर, हैदराबाद, नाभा और जींद के शासकों ने पूरी तरह से अंग्रेजों की मदद की थी। जिसे ब्रिटिश सरकार कायम रखना चाहती थी। विक्टोरिया के घोषणापत्र में वफादार राजाओं, नवाबों, जमींदारों को पुरष्कृत करने और विद्रोहियों को सजा देने की नीति अपनाई गई। 1876 ई० में ब्रिटिश संसद ने एक रॉयल टाइटल्स’ अधिनियम पास कर महारानी विक्टोरिया को भारत में समस्त ब्रिटिश प्रदेश और भारतीय रियासतों सहित भारत की साम्राज्ञी’ की उपाधि से विभूषित किया।

(v) आर्थिक प्रभाव- विद्रोह के पश्चात अंग्रेजों द्वारा नियन्त्रित चाय, कपास, कॉफी, तम्बाकू आदि के व्यापार को तो बढ़ावा दिया गया किन्तु भारतीय कुटीर उद्योगों को संरक्षण नहीं दिया गया। ईस्ट इण्डिया कम्पनी भारत सरकार पर 3 करोड़ 60 लाख पौण्ड का कर्ज छोड़ गई, जिसकी पूर्ति सरकार ने भारतीयों का शोषण करके ही की। इस शोषण से देश निरन्तर गरीब होता गया।

(vi) भारतीय राष्ट्रवाद का उदय- 1857 ई० के विद्रोह की विफलता ने भारतीयों को यह दिखा दिया कि सिर्फ सेना और शक्ति के बल पर ही अंग्रेजों से मुक्ति नहीं मिल सकती थी, बल्कि इसके लिए सभी वर्गों का सहयोग, समर्थन और राष्ट्रीय भावना आवश्यक थी। इसलिए 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से इस दिशा में प्रयास आरम्भ कर दिए गए। 1855 ई० में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से इस विरोध को एक निश्चित दिशा भी मिल गई।



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