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लेखक ने फादर बुल्के को मानवीय करुणा’ की दिव्य चमक क्यों कहा है?

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फादर बुल्के के हृदय में हर किसी के लिए करुणा का सागर भरा हुआ था। उनके मुख पर एक दिव्य चमक रहती थी। वे सबको बाहें खोल गले लगाने को उत्सुक रहते थे। उनमें अपनत्व, ममत्व, करुणा, प्रेम, वात्सल्य तथा सहृदयता की भावना कूट-कूट कर भरी थी। वे किसी से रिश्ता बनाते तो कभी तोड़ते नहीं थे। दसों साल बाद भी मिलने पर उसी आत्मीयता से मिलते थे।

अपने प्रियजनों से मिलने के लिए गर्मी, सर्दी, बरसात झेलकर भी मिलने चले आते थे। लोगों के दुःख में शरीक होकर सांत्वना देते । उनके सांत्वना के जादू भरे दो शब्द जीवन में एक नई रोशनी भर देती थी। लेखक की पत्नी और पुत्र की मृत्यु पर फादर द्वारा कहे गए शब्दों में असीम शांति भरी थी। इन सभी कारणों से लेखक ने फादर बुल्के को मानवीय करुणा की दिव्य चमक कहा है।



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