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लहनासिंह एक सच्चा सिपाही था। सिद्ध कीजिए।

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एक सच्चे सिपाही की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह साहस नहीं छोड़ता। तुरन्त निर्णय लेता है और कर्त्तव्य से पीछे नहीं हटता। ये तीनों बातें लहनासिंह में थीं। वह साहसी थी । उसको दो घाव लग चुके थे पर उसने हिम्मत नहीं हारी। पट्टियाँ कसकर लहू को रोक दिया और सत्तर जर्मन सिपाहियों का सामना करती रहा। खड़े-खड़े गोलियाँ चला रहा था और जर्मनों को मृत्यु शैय्या पर सुला रहा था। उसने जर्मन अफसर को पहचान कर तुरन्त निर्णय कर लिया कि उसे क्या करना है। वजीरासिंह को तुरन्त सूबेदार को लौटाने के लिए भेज दिया और जर्मन अफसर की गतिविधियों पर पूरा ध्यान रखा। उसने दो कर्तव्य निभाये। एक, बोधासिंह के प्रति क्योंकि वह वचनबद्ध था। दूसरी, अपनी ड्यूटी के प्रति भी कर्तव्य का निर्वाह किया। खन्दक में खड़े होकर उसने खाई को भी देखा और बोधा को भी देखा। हजारासिंह उसे खन्दक की रक्षा के लिए छोड़ गया था जिसका उसने पूरी तरह से पालन किया। स्पष्ट है वह साहसी, बुद्धिमान और कर्तव्यनिष्ठ था।



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