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Answer» संवाद कथा साहित्य के प्राण हैं। इनसे कथा का विस्तार होता है, कथा में रोचकता आती है। संवाद जितने छोटे, सहज, स्वाभाविक, पात्रानुकूल और परिस्थितिजन्य होंगे उतने ही रोचक होंगे और पाठकों को बाँधने वाले होंगे। छोटे संवाद शिष्य तुलसी से पूछता है- “भगवान के भोजन में कौन-कौन व्यंजन बनेंगे।” तुलसी का छोटा-सा उत्तर है- “जो भगवान को रुचता हो वही बनाओ।” छोटा-सा संवाद है किन्तु सार्थक और समयानुकूल है। रत्नावली को देखकर राजा से पूछा- “इन्हें क्यों लाए।” भृत्य से रत्नावली के सम्बन्ध में पूछा ”वह कहाँ हैं”? छोटा सा उत्तर मिला- “रसोईघर में रसोइये को सहायता दे रही हैं। ऐसे छोटे-छोटे संवाद रोचकता बढ़ाते हैं। बड़े संवाद कहीं-कहीं लम्बे संवाद भी हैं। राजा भगत और तुलसीदास के संवाद थोड़े बड़े हैं। उदाहरण देखिए-राजा तुलसीदास से कह रहे हैं- “काहे खुनसाते हो भइया । तुम्हारी जिभ्या से भगवान जी स्वाद लेते हैं। गोसाइयों में हमें यही बात तो अच्छी लगती है कि गोसाई लोग दुनिया का हर भोग राजी होकर ग्रहण करते हैं पर अपने स्वाद और सुख को वे भगवान का मानकर ही चलते हैं।” कथन बड़ा है। पर रोचक है। पात्रानुकूल संवाद संवाद पात्रानुकूल हैं। नत्थू नाई है, अनपढ़ है। उसके संवाद उसी के अनुकूल हैं। नत्थू समाज में रत्नावली को लेकर जो चर्चा है। उसका जिक्र करता है। उसकी भाषा उसके अनुकूल है। वह ‘गिरहस्त’ और ‘तपिस्या’ जैसे साधारण शब्दों का प्रयोग करता है। दूसरी ओर टोडर का कथन संभ्रान्त व्यक्ति जैसा है- “हाँ हाँ वहाँ जाएँगी और यहाँ भी पधारेंगी। जिस दिन गठजोड़ से महात्मा जी की जूठन गिरने का सौभाग्य मेरे घर को मिलेगा उस दिन मेरा जन्म सार्थक हो जाएगा।” परिस्थितिजन्य संवाद संवाद परिस्थितजन्य भी हैं। गोसाई होकर तुलसीदास को क्या सुख मिला। इसका वे स्वयं वर्णन करते हैं। दूध पीते समय वे कहते हैं- “गोसाई क्या बना हूँ आठों पहर तर माल चाभते-चाभते दुखी हो गया हूँ। कहाँ तो एक वह दिन था कि कटोरी भर छाछ पाने के लिए मैं ललाता था और कहाँ अब इस सोंधे दूध की मलाई को खाते भी खुनस आती है।” संवेदनशील संवाद संवाद संवेदनशील भी हैं। रत्नावली और तुलसीदास के मिलन के संवाद गम्भीर और उस परिस्थिति के अनुकूल ही हैं। संवाद छोटे भी हैं। संवाद की गम्भीरता देखिए- “जय सियाराम बाहर आसन बिछा होगा, विराजो।” रत्ना का कथन- “मैंने रामचरित मानस का पारायण किया था। मैंने उसे वाल्मीकि जी की कृति से श्रेष्ठ भक्ति प्रदायक माना।” “मुझे रामचरित मानस की एक प्रति चाहिए।” “रो रही हो रत्ना”-“संतोष के आँसू हैं। इस प्रकार के गम्भीर और परिस्थितिजन्य संवाद भी हैं। अतः स्पष्ट है कि संवाद की दृष्टि से यह अंश श्रेष्ठ है।
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