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मानस का हंस (उपन्यास अंश) लेखक परिचय।

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अमृत लाल नागर (1916 ई.-1990 ई.) ने लगभग आधी सदी तक अपने सक्रिय लेखन से साहित्य-जगत् में अप्रतिम योगदान किया। उनका व्यक्तित्व बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न था। इन्होंने हिन्दी गद्य की लगभग समस्त विधाओं में लेखनी चलाई। अमृत लाल नागर संवादों के शिल्पी, घरेलू जीवन के कुशल चित्रक, कथा गठन में माहिर, मनुष्य के अन्तर्विरोधों को उभारकर उसकी दुर्बलताओं पर करारे व्यंग्य करने वाले एवं मनुष्य की मूर्खता का गम्भीरता के साथ मजाक उड़ाने वाले रचनाकार हैं। निम्न वर्ग, मध्य वर्ग तथा अभिजात्य वर्ग की विषम परिस्थितियों एवं उनकी संस्कृति के सफल और कुशल चित्रकार हैं। उनकी भाषा में उर्दू के शब्दों का सुन्दर प्रयोग हुआ है, किन्तु उससे हिन्दी की स्वाभाविकता में कोई बाधा नहीं पहुँचती। प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैंउपन्यास-बूँद और समुद्र, सुहाग के नूपुर, अमृत और विष, एकदा नैमिषारण्ये, मानस का हंस, नाच्यौ बहुत गोपाल, खंजन नयन। कहानी-संग्रह -वाटिका, अवशेष, एटम बम, पीपल की परी, एक दिल हजार अफसाने आदि। अन्य- चैतन्य महाप्रभु (जीवनी), साहित्य और संस्कृति (निबन्ध), चकल्लस (व्यंग्य), हमारे युग निर्माता, सतखण्डी हवेली का मालिक (बाल साहित्य) आदि।



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