1.

‘मानस का हंस’ उपन्यास के पाठांश का सार अपने शब्दों में लिखिए।

Answer»

तुलसीदास लोलार्क कुण्ड के मठ में कृष्ण की आरती कर रहे हैं और कृष्ण भक्ति का पद गाते हैं। भक्तों को कृष्ण भक्ति का महत्व बताते हैं। उन्होंने कहा कि सब देवों की उपासना करो पर अपने इष्ट को मत भूलो ह अपने आप प्रकट हो जाएगा।

एकान्त होने पर तुलसी अपने बारे में सोचने लगे। वे सोचते हैं-मैंने सब कुछ किया, सन्तों की वाणी सुनी, साधना की, पर प्रभु के प्रत्यक्ष दर्शन नहीं हुए। उनका मन अस्थिर है। वे प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि एक बार आप यह कह दीजिए कि तुलसीदास मेरा है। मुझे आप को भरोसा है। आप अपना लेंगे तो मुझे सन्तोष हो जाएगा। राजा भगत के आने पर वे प्रसन्न हो जाते हैं, परन्तु रत्नावली को देखकर उनका मन कुछ खिन्न हो जाता है। यद्यपि वे रत्नावली और राजा के ठहरने की व्यवस्था करते हैं। रत्नावली गंगा स्नान के बाद रसोइये की सहायता के लिए रसोई में चली गई। रत्नावली के द्वारा बनाये भोजन में तुलसीदास को स्वाद आया। टोडर से तुलसीदास ने राजा भगत का परिचय कराया। टोडर ने दोनों को अपने घर आने का निमंत्रण दिया।

तुलसीदास के मन में रत्नावली के प्रति मोह था। वे रत्नावली से मिलना चाहते थे पर रत्नावली सतर्कतापूर्वक बचकर निकल जाती। तुलसीदास दूध पीकर लेट गये। वे राम का नाम जपते हैं पर रत्नावली उनके मन से नहीं हटी, वे सोचने लगे कि मैं रत्नावली के प्रति निठुराई दिखा रहा हूँ शायद इसलिए रामजी मेरे प्रति दयालु नहीं हैं। उनके मन में अन्तर्द्वन्द्व चलता रहा। राजा भगत ने रत्नावली की साधना और जोगिन रूप की प्रशंसा की जिसे सुनकर तुलसीदास को सन्तोष मिला। तुलसीदास के मन में बार-बार आता कि वह रत्नावली से मिलें। रत्नावली उनसे अपने दुख-सुख की बात कहे। राजा ने समझाया कि सीता को बिना राम को कष्ट हुआ। एकाकी जीवन सुखी नहीं हो सकता। टोडर, गंगाराम, कैलाश और शिष्यों ने रत्नावली को मठ में रखने का आग्रह किया पर तुलसी ने यह कहकर- “विरक्त अब फिर से राग के बंधनों में नहीं बँध सकता” बात टाल दी। तुलसी ने कहा कि यदि वे राग में फंस जायेंगे तो समाज की आस्था अधर में लटक जाएगी। तुलसीदास ने कहा कि आज का समय बल्लभाचार्य और कबीर को नहीं है। नत्थू ने तुलसीदास को रत्नावली को लेकर जो चर्चा हो रही है, उसे सुनाया। तुलसीदास को यह सुनकर दुख हुआ।

तुलसीदास ने नौकर को बुलाकर रत्नावली के पास सन्देश भिजवाया कि वे शीघ्र राजपुर चली जायें। रत्नावली ने उत्तर में कहलाया कि वे मिलना चाहती हैं। तुलसीदास ने स्वीकृति दे दी। रत्नावली आई, आसन पर बैठी, पर दोनों के बीच में पर्दा पड़ा था। अन्त में रत्नावली ने रामचरित मानस की एक प्रति माँगी और एक भिक्षा माँगी, “मेरी मृत्यु से पहले एक बार मुझे अपना श्रीमुख दिखलाने की कृपा करें।” तुलसी ने इसे स्वीकार कर लिया।



Discussion

No Comment Found