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मार्ले-मिण्टो सुधार पर टिप्पणी कीजिए।

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मार्ले-मिण्टो सुधार( 1909 ई० )- मार्ले-मिण्टो सुधार वस्तुतः मुसलमानों को खुश करने, नरमपंथियों को उलझन में डालने और अतिवादियों को शान्त करने का प्रयास था। संक्षेप में इस सुधार का उद्देश्य अधिकार देने के स्थान पर ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का अनुसरण करना था। इस अधिनियम की निम्नलिखित विशेषताएँ थीं

⦁    इसके द्वारा केन्द्रीय लेजिस्टलेटिव के सदस्यों की संख्या बढ़ाकर अब 69 कर दी गई, किन्तु न उनके अधिकार बढ़े और न ही उनकी शक्तियाँ।।

⦁    अधिनियम के अनुसार वायसराय की कार्यकारिणी परिषद् तथा प्रान्तीय कार्यकारिणी परिषदों में एक भारतीय सदस्य की नियुक्ति का प्रावधान किया गया।

⦁    इस अधिनियम का सबसे बड़ा दोष मुसलमानों के लिए पृथक् चुनाव मण्डल प्रदान करना था। इसका आशय यह था कि मुसलमान सम्प्रदाय को भारतीय राष्ट्र से पूर्णतया पृथक् वर्ग के रूप में स्वीकार किया गया। इस अधिनियम की उल्लेखनीय उपलब्धि यह भी रही कि इसके द्वारा भारत सचिव की परिषद् तथा भारत के गवर्नर जनरल की कार्यपालिका परिषद् में भारतीय सदस्यों का समावेश किया गया।

⦁    इस प्रकार इस अधिनियम में सुधारों के नाम पर चुनाव पद्धति में साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया गया ताकि भारतीय राष्ट्रवादियों की एकता को तोड़कर उन्हें विभिन्न भागों में बाँट दिया जाए। यह अधिनियम एक कूटनीतिक चाल साबित हुआ। इसके माध्यम से मुसलमान युवकों को कांग्रेस में जाने से रोका गया और उग्र राष्ट्रवादियों के भारतीय कांग्रेस में आने पर नियन्त्रण किया गया। महान् उदारवादी मदनमोहन मालवीय और सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने इन सुधारों की तीव्र आलोचना की। वहीं मुस्लिम लीग इन सुधारों से बहुत प्रसन्न थी।



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