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‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य की कथावस्तु (कथानक या सारांश) संक्षेप में लिखिए।या‘मातृभूमि के लिए खण्डकाव्य के आधार पर चन्द्रशेखर आजाद के जीवन की प्रमुख घटनाओं का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।या‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के आधार पर चन्द्रशेखर आजाद का जीवन-चरित्र संक्षेप में लिखिए।या‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के आधार पर चन्द्रशेखर आजाद की राष्ट्रनिष्ठा का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। |
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Answer» डॉ० जयशंकर त्रिपाठी द्वारा रचित ‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य तीन सर्गों में विभक्त है– प्रथम सर्ग में चन्द्रशेखर आजाद के काशी में छात्र-जीवन का प्रसंग है। चन्द्रशेखर आजाद का जन्म मध्य प्रदेश के भाँवरा ग्राम में हुआ था। बड़े होने पर वे कोशी नगरी में संस्कृत पढ़ने गये। उस समय भारत में ब्रिटिश शासन का दमन-चक्र चल रहा था। भारतीय जनता के दमन के लिए रॉलेट ऐक्ट बनाया गया था। इस राष्ट्र-विरोधी ऐक्ट का विरोध करने के लिए अमृतसर में सन् 1919 ई० में जलियाँवाला बाग में एक विशाल सभा आयोजित की गयी थी। उसी समय जनरल डायर ने वहाँ पहुँचकर गोलियों की बौछार करके निरीह जनता को भून डाला। अंग्रेजों की उक्त दमन की घटना को पढ़कर किशोर चन्द्रशेखर का मुख क्रोध से तमतमा उठा और आँखें करुणा से भर आयीं। उसने भारतमाता को यातना से मुक्ति दिलाने का निश्चय किया। द्वितीय सर्ग में चन्द्रशेखर आजाद के संघर्ष का वर्णन किया गया है। देश में असहयोग आन्दोलन के मन्द पड़ते ही चन्द्रशेखर का झुकाव शस्त्र-क्रान्ति की ओर हो गया। उन्हें स्वतन्त्रता-संग्राम के लिए बमों और पिस्तौलों का निर्माण कराने के लिए धन की आवश्यकता हुई। इन्होंने सरदार भगतसिंह, अशफाक उल्ला खाँ, रामप्रसाद बिस्मिल, मन्मथनाथ गुप्त, शचीन्द्रनाथ बख्शी आदि के साथ मिलकर 9 अगस्त, 1925 ई० को काकोरी स्टेशन के पास रेलगाड़ी से सरकारी खजाने को लूटने में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। इस काण्ड में पकड़े जाने पर कुछ क्रान्तिकारियों को फाँसी और कुछ को जेल की सजा हुई, परन्तु चन्द्रशेखर आजाद और भगतसिंह सरकार की नजर से बच निकले। सन् 1928 ई० में साइमन कमीशन भारत में हो रहे स्वाधीनता के झगड़ों की जाँच के लिए आया। इस कमीशन के सारे सदस्य अंग्रेज थे। जहाँ भी यह कमीशन गया, वहीं उसका बहिष्कार और अपमान करके रोष प्रकट किया गया। पंजाब केसरी लाला लाजपत राय पर पुलिस अफसर स्कॉट ने लाठियों का घातक प्रहार किया, जिससे कुछ ही दिनों के बाद उनका देहान्त हो गया। | चन्द्रशेखर आजाद ने भगत सिंह और राजगुरु से मिलकर लाला लाजपत राय के हत्यारे पुलिस ऑफिसर स्कॉट को मारने की योजना बनायी। स्कॉट के स्थान पर साण्डर्स मारा गया। इस घटना से ब्रिटिश हुकूमत पर मानो बिजली गिर पड़ी। तृतीय सर्ग में ‘आजाद’ के जीवन के अन्तिम समय की क्रियाशीलता और बाधाओं का वर्णन किया गया है। आजाद’ जब बहुत थक जाते थे, तब वे प्रकृति के बीच जाकर विश्राम करते थे। मध्य प्रदेश की सातार नदी के तट पर हनुमान जी का मन्दिर और पर्वत की गुफा उनका ऐसा ही विश्राम-स्थल था। एक दिन आजाद फूलबाग की सभा में सशस्त्र क्रान्ति के विरुद्ध एक नेता का भाषण सुन रहे थे। वहीं पर खड़े गणेश शंकर विद्यार्थी ने उनके उत्तेजित मन को शान्त किया और कहा-“देख आजाद! नेता की, अनजानी बातों को मत सुनना। उन्हें इस बात का भय था कि आजाद कहीं इस सभा को भंग ने कर दें। फरवरी, सन् 1931 ई० को प्रयाग के अल्फ्रेड पार्क में बैठकर वे कुछ मित्रों से बातें कर रहे थे। उसी समय वहाँ पुलिस की गाड़ी आकर रुकी और पुलिस ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया। आजाद ने अपनी पिस्तौल में गोलियाँ भरीं और पुलिस से मोर्चा लिया। पहली ही गोली में उन्होंने एक अफसर का जबड़ा उड़ा दिया। नॉट बाबर नाम के अंग्रेज एस० पी० की कलाई उड़ा दी। वह निरन्तर पुलिस पर गोलियाँ बरसाते रहे, परन्तु जब उस एकाकी वीर के पास अकेली गोली बची, तो उसे उसने अपनी कनपटी पर मारकर वीरगति प्राप्त कर ली। आजाद ने जिस जामुन के पेड़ की ओट लेकर संघर्ष किया था, वह पेड़ भारतीय जनता का पूजा-स्थल बन गया। |
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