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‘मैं बना-बना कितने जग रोज मिटाता’-से कवि का क्या तात्पर्य है?

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कवि होने के कारण वह अपनी कल्पना में अनेक लोकों की रचना करता है। अपने रचे हुए जगत् को जब वह अपने आदर्शों के अनुकूल नहीं पाता तो उनको मिटा देता है। यह सृजन और विनाश उसका नित्य का कार्य है। फिर वह उस संसार की चिन्ता क्यों करे जिससे उसके विचार नहीं मिलते।



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