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मैं समझ गया! आपातकाल एक तरह से तानाशाही निरोधक टीका था। इससे दर्द हुआ और बुखार भी आया, लेकिन अन्ततः हमारे लोकतन्त्र के भीतर क्षमता बढ़ी।

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भारत में जून 1975 में श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा आपातकाल लागू करवाने की सिफारिश की गई और सम्पूर्ण देश में आपातकाल लागू कर दिया गया। तत्कालीन सरकार का दावा था कि वह.आपातकाल लागू करके कानून व्यवस्था को बहाल करना चाहती थी, कार्यकुशलता बढ़ाना चाहती थी और गरीबों के हित में कार्यक्रम लागू करना चाहती थी। लेकिन आलोचकों ने ध्यान दिलाया कि सरकार के ज्यादातर वायदे पूरे नहीं हुए तथा सरकार अपने वायदों की ओट लेकर ज्यादतियों से लोगों का ध्यान हटाना चाहती थी।
आपातकाल के दौरान पुलिस हिरासत में मौत और यातनाओं की घटनाएँ घटी। गरीब लोगों को मनमाने ढंग से एक जगह से उजाड़ कर दूसरी जगह बसाने की भी घटनाएँ हुईं। जनसंख्या नियन्त्रण के अति उत्साह में लोगों को अनिवार्य रूप से नसबन्दी के लिए मजबूर किया गया। आपातकाल से सबक-आपातकाल में एकबारगी भारतीय लोकतन्त्र की ताकत और कमजोरियाँ उजागर हुईं। पर्यवेक्षकों का मानना है कि आपातकाल के दौरान भारतीय लोकतन्त्र लोकतन्त्र नहीं रहा लेकिन यह भी सही है कि थोड़े ही दिनों के अन्दर कामकाज फिर से लोकतान्त्रिक ढर्रे पर लौट आया। 

आपातकाल के प्रमुख सबक निम्नलिखित हैं-

⦁    आपातकाल का प्रथम सबक तो यही है कि भारत से लोकतन्त्र को विदा कर पाना अत्यन्त कठिन है।
⦁    दूसरे, आपातकाल से संविधान में वर्णित आपातकाल के प्रावधानों के कुछ अर्थगत उलझाव भी प्रकट हुए, जिन्हें बाद में सुधार लिया गया। अब आन्तरिक आपातकाल सिर्फ सशस्त्र विद्रोह की स्थिति में लगाया जा सकता है। इसके लिए यह भी आवश्यक है कि आपातकाल की घोषणा की सलाह मन्त्रिपरिषद् राष्ट्रपति को लिखित में दे।
⦁    तीसरे आपातकाल से हर कोई नागरिक अधिकारों के प्रति ज्यादा सचेत हुआ। आपातकाल की समाप्ति के बाद अदालतों ने व्यक्ति के नागरिक अधिकारों की रक्षा में सक्रिय भूमिका निभाई।

इस प्रकार आपातकाल ने भारतीय प्रशासन व जनता को सबक सिखाया तथा लोकतान्त्रिक व्यवस्था की प्रामाणिकता को भी सिद्ध किया।



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