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‘मैना दूसरों पर अनुकंपा ही दिखाया करती है।’ ऐसा लेखक ने क्यों कहा है ?

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लेखक जिस नये मकान में रहते थे, वहाँ के मकान के निर्माताओं ने दीवारों में चारों ओर एक-एक सुराणा छोड़ रखी है। इस सुराख्न में एक मैना दम्पत्ति नियमित भाव से प्रतिवर्ष गृहस्थी जमाया करते थे, ये तिनके और कपड़ों का अंबार लगा देते थे। पति-पत्नी जब कोई एक तिनका लेकर सुराख्न में रखते थे तो उनके भाव देखने लायक होते थे। वे नाना प्रकार की मधुर और विजयोद्घोषी वाणी में गाना शुरू कर देते थे। लेखक के परिवारवालों की वे तनिक भी परवाह नहीं करते। दोनों के नाचगान और आनंद-नृत्य से सारा मकाम मुखरित हो उठता था। मैना का ऐसा मुखरित स्वभाव देखकर ही लेखक ने कहा कि मैना दूसरों पर अनुकंपा दिखाया करती है।



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