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“मेरा मन विविध ताप से जल रहा है।” कथन के आधार पर तुलसीदास की मन:स्थिति का वर्णन कीजिए। |
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Answer» नत्थू की बात सुनकर तुलसीदास के मन में अन्तर्द्वन्द्व उत्पन्न हो गया। वे प्रभु से कहने लगे कि मेरा मन स्थिर नहीं है। यह बौरा गया है। कभी योगाभ्यास करता है तो कभी भोग विलास में हँस जाता है। कभी कठोर और दयावान बन जाता है। कभी दीन, मूर्ख, कंगाल और कभी घमण्डी राजा बन जाता है। वह कभी पाखण्डी और कभी ज्ञानी बनता है। कभी धन का लालच सताता है, कभी शत्रुमय बन जाता है। कभी जगत को नारीमय देखने लगता है। यह संसार मेरे मन को विविध प्रकार से सता रहा है। तुलसीदास का मन स्थिर नहीं है। वे अपने मन से दुखी हैं क्योंकि संयम, जप, तप, नियम, धर्म, व्रत आदि करने से भी मन स्थिर नहीं हो रहा है। मन में उठने वाले विविध विचारों के कारण ही तुलसीदास कहते हैं कि मेरा मन विविध तापों से जल रहा है। वे भगवान से अटल भक्ति की कामना करते हैं। |
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