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Answer» प्राचीन विचारकों- मनु, शुक्र, बृहस्पति और कौटिल्य आदि ने राज्य के कार्यों और राजा के कर्तव्यों पर विस्तार से विचार किया है। सामान्य रूप से उन्होंने प्राचीन भारत के राजनीतिक चिन्तन में राज्य को व्यापक कार्यक्षेत्र प्रदान किया है। मनु का राजत्व सिद्धान्त राज्य के कार्यक्षेत्र और राजा की शक्तियों के प्रसंग में आचार्य मनु के राजनीतिक चिन्तन की निम्नलिखित दो बातें प्रमुख हैं- (क) मनु ने सदैव इस बात पर जोर दिया है कि राजा द्वारा कर्तव्यपालन किया जाना चाहिए और राजा का सर्वोच्च कर्तव्य है—प्रजा-पालन। मनु के शब्दों में, “राजा को अपनी प्रजा के प्रति पिता के समान व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि प्रजा का पालन करना राजा का श्रेष्ठ धर्म है और प्रजा-पालन द्वारा शास्त्रोक्त फल को भोगने वाला राजा धर्म से युक्त होता है।” (ख) उसने राजा को निरंकुश शक्तियाँ प्रदान नहीं कीं, वरन् राजसत्ता को सीमित किया है। मनु के अनुसार, राजा को समझना चाहिए कि वह धर्म के नियमों के अधीन है। कोई भी राजा धर्म के विरुद्ध व्यवहार नहीं कर सकता, धर्म राजाओं और जनसाधारण पर एकसमान ही शासन करता है। इसके अतिरिक्त, राजा (राजनीतिक प्रभु) जनता के भी अधीन है। वह अपनी शक्तियों के प्रयोग करने में जनता की आज्ञा-पालन की क्षमता से सीमित होता है। सालेटोर के अनुसार, “मनु ने निस्सन्देह यह कहा है कि जनता राजा को गद्दी से उतार सकती है और उसे मार भी सकती है, यदि वह अपनी मूर्खता से प्रजा को सताता है।” राज्य के कार्यक्षेत्र के सम्बन्ध में मनु के चिन्तन की महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उसने मानवमात्र के कर्तव्यों और स्वधर्म-पालन पर बल दिया है जिसे अपनाकर सम्पूर्ण मानव-जाति सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर सकती है। मनु ने ऐसी कानूनी पद्धति तथा राजधर्म का वर्णन किया है। जिसमें सभी वर्गों के व्यक्तियों के कर्तव्यों की व्याख्या की गयी है। मनु के अनुसार राज्य के कार्य मनु ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ ‘मनुस्मृति’ में राज्य के कार्यों पर समुचित विचार किया है। मनु के अनुसार, राज्य के प्रमुख रूप से निम्नलिखित कार्य हैं- 1. बाहरी आक्रमण से देश की रक्षा करना – मनु के मत से राज्य का सर्वप्रमुख कार्य बाहरी आक्रमण से देश की रक्षा करना है। मनु के अनुसार, राजा को चाहिए कि वह सेना को तैयार रखे, सैनिक शक्ति का प्रदर्शन करता रहे और अपने गुप्तचरों की सहायता से शत्रु की कमजोरियों का ज्ञान प्राप्त करे। उसे अप्राप्त को पाने की इच्छा और प्राप्त भूमि की रक्षा करनी चाहिए। राजा को राज्य की सुरक्षा के लिए स्वयं पहाड़ी दुर्ग में निवास करना चाहिए, क्योंकि वह सभी दुर्गों में श्रेष्ठ होता है। 2. आन्तरिक शान्ति स्थापित करना – मनु यह मानते थे कि समाज के अराजक तत्त्व आन्तरिक शान्ति भंग करने का कारण बन सकते हैं, इसलिए राज्य का एक प्रमुख कार्य दण्ड-शक्ति के आधार पर दुष्टों को नियन्त्रण में रखना है। राज्य के द्वारा उनके प्रति बहुत कठोर व्यवहार किया जाना चाहिए। राज्य को भ्रष्ट व्यक्तियों, जुआरियों तथा धोखेबाजों को दण्डित करना चाहिए और गलत ढंग से चिकित्सा करने वालों पर भारी जुर्माना किया जाना चाहिए। मनु के अनुसार, वैश्यों और शूद्रों को अपने कर्तव्यों का सुचारु रूप से पालन करने के लिए विवश करना भी राज्य का कार्य है। मनु इस बात पर भी बल देता है कि स्त्रियों की सम्पत्ति को हथियाने वाले व्यक्तियों को राज्य द्वारा कठोर दण्ड दिया जाना चाहिए। 3. विवादों का निर्णय (न्यायिक कार्य) करना – राज्य का एक प्रमुख कार्य लोगों के आपसी विवादों का निर्णय करना और विभिन्न समुदायों के बीच होने वाले झगड़ों का निपटारा करना है। इस हेतु न्यायालयों का गठन किया जाना चाहिए ताकि जनसाधारण को निष्पक्ष न्याय सुलभ हो सके। राज्य को इन सभी विवादों का निर्णय धर्म-विधानों का ध्यान रखकर करना चाहिए। मनु के अनुसार, “जिस सभा (न्यायालय) में असत्य द्वारा सत्य पीड़ित होता है उसके सदस्य ही पाप से नष्ट हो जाते हैं।” 4. राज्य का आर्थिक विकास और प्रगति करना – मनु राज्य का अन्य प्रमुख कार्य राज्य का आर्थिक विकास और प्रगति बताते हैं। मनु के अनुसार, “राजा अप्राप्त (न मिले हुए सोने, चाँदी, हीरे, जवाहरात, भूमि आदि) को दण्ड द्वारा (शत्रु को दण्ड देकर या जीतकर) पाने की इच्छा करे। प्राप्त (मिले हुए सोना आदि) द्रव्यों की देखभाल करते हुए रक्षा करे तथा रक्षित धन की वृद्धि करे और बढ़ाये गये (उन द्रव्यों) को सुपात्रों में दान कर दे।” (मनुस्मृति, 7:101) इस प्रकार शासन की नीति चार सूत्री होनी चाहिए- ⦁ शक्ति और वैध उपायों द्वारा धन अर्जित करना, ⦁ धन का रक्षण करना, ⦁ धन में वृद्धि करना, ⦁ धन सुपात्रों को दान करना। कर की व्यवस्था (Taxation) करना – राज्य में सभी व्यवस्थाओं के संचालन के लिए धन की आवश्यकता होती है, इसलिए मनु ने अनेक करों (Taxes) का सुझाव दिया है। मनु ने निम्नलिखित चार प्रकार के कर बताये है- ⦁ बलि-विभिन्न प्रकार के कर। ⦁ शुल्क–बाजार या हाट में व्यापारियों द्वारा बिक्री के लिए लायी गयी वस्तुओं पर चूँगी। ⦁ दण्ड-कर-जुर्माने। ⦁ भाग-लगान। मनु द्वारा निर्दिष्ट कर-सम्बन्धी धारणा में उसकी बुद्धिमत्ता और लोक-कल्याणकारी प्रवृत्ति की झलक मिलती है। मनु राज्य की प्रगति के लिए राज्य द्वारा कर लिया जाना आवश्यक मानते हैं, किन्तु वे कर को उचित सीमा तक ही लिये जाने का समर्थन करते हैं। मनु के अनुसार, “कर न लेने से राजा के और अत्यधिक कर लेने से प्रजा के जीवन का अन्त हो जाता है।” अधिक कर का निषेध करते हुए मनु कहते हैं- जिस प्रकार बछड़ा और मधुमक्खी अपने खाद्य क्रमशः दुध और मधु थोड़ी-थोड़ी मात्रा में ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार राज्य को प्रजा से। थोड़ा-थोड़ा वार्षिक कर ग्रहण करना चाहिए। मनु का मत था कि कर इस प्रकार निर्धारित हो कि निर्धन जनता पर कर का बोझ कम पड़े और समृद्ध व्यक्ति अधिक कर का भार उठाये। मनु ने वस्तुओं के मूल्य पर नियन्त्रण रखने को राज्य का एक कर्तव्य माना। 5. स्थानीय स्वशासन संस्थाओं का प्रबन्ध करना – मनु राज्य द्वारा स्थानीय स्वशासन संस्थाओं का प्रबन्ध किये जाने का समर्थन करता है। उसने अपनी प्रशासनिक व्यवस्था के अन्तर्गत स्थानीय स्वशासन संस्थाओं को महत्त्वपूर्ण माना है और स्थानीय विषयों का भार इन संस्थाओं को ही सौंपने का निर्देश दिया है। 6. असहाय व्यक्तियों की सहायता करना – मनु असहाय व्यक्तियों की सहायता करना भी राज्य का प्रमुख कार्य मानता है। उसके अनुसार, राज्य द्वारा सन्तानविहीन स्त्रियों, विधवाओं तथा रोगियों की देखभाल की जानी चाहिए और अवयस्कों की सम्पत्ति की रक्षा करनी चाहिए। 7. शिक्षा का प्रबन्ध करना – राज्य को शिक्षा की व्यवस्था भी करनी चाहिए तथा उसे शिक्षकों के हितों का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए। राज्य के द्वारा वेदों का अध्ययन और अध्यापन करने वाले ब्राह्मणों को दान देकर आर्थिक सहायता की जानी चाहिए। इस प्रकार मनु ने राज्य के कार्यक्षेत्र को बहुत व्यापक माना है, किन्तु उसे निरंकुश नहीं बताया है। राजा धर्म के अधीन है। वह धर्म के विरुद्ध व्यवहार नहीं कर सकता। केवल मोटवानी का मत है, “मनु के निर्देशन में राज्य द्वारा बनाये जाने वाले अनेक कानून वर्तमानकालीन राजशास्त्र के विद्यार्थी को समाजवादी प्रतीत होंगे।” वस्तुतः मनु द्वारा व्यक्त राज्य एक कल्याणकारी राज्य है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को बौद्धिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक विकास की सर्वोच्च अवस्था प्राप्त करने का अवसर मिलता है। कौटिल्य की राज्य के प्रति अवधारणा तथा राज्य सम्बन्धी सप्तांग सिद्धान्त कौटिल्य के अनुसार, राजा के द्वारा उपर्युक्त सभी कार्यों को सम्पादन लोकहित की भावना से ही किया जाना चाहिए। कौटिल्य राजतन्त्र को शासन का एकमात्र स्वाभाविक और श्रेष्ठ प्रकार मानता है। वह राज्य के सात अंगों में राजा को सर्वोच्च स्थिति प्रदान करता है। इतना होने पर भी कौटिल्य का राजा निरंकुश नहीं है। उस पर निम्नलिखित कुछ ऐसे प्रतिबन्ध हैं जिनके कारण वह मनमानी नहीं कर सकता-. 1. अनुबन्धवाद – कौटिल्य के अनुसार, मनुष्यों ने राजा की आज्ञाओं के पालन की जो प्रतिज्ञा की उसके बदले में राजा ने अपनी प्रजा के धन-जन की रक्षा का वचन दिया था। इसीलिए राजा प्रजा के जन-धन को हानि पहुँचाने वाला कोई कार्य नहीं कर सकता। कौटिल्य का मत है कि राजा की स्थिति वेतन-भोगी सैनिकों के समान ही होती है, अर्थात् राजा राजकोष से निश्चित वेतन ले सकता है। उसे मनमाने ढंग से राज्य की सम्पत्ति को व्यय करने का अधिकार नहीं था। 2. धर्म और रीति-रिवाज – कौटिल्य के अनुसार, राजा के अधिकार धर्म और रीति-रिवाज सीमित थे और वह इनका पालन करने के लिए बाध्य था। उसे यह डर रहता था कि राजा द्वारा इन नियमों का उल्लंघन किये जाने पर जनता क्षुब्ध होकर स्वयं ही उसके जीवन का अन्त न कर दे। तत्कालीन जीवन में धर्म और परलोक की भावना बहुत प्रबल होने के कारण नरक को भये भी राजा को मनमानी करने से रोकता था। 3. मन्त्रिपरिषद् – राजा की शक्ति पर मन्त्रिपरिषद् का भी प्रतिबन्ध होता था। उसके अनुसार राजा और मन्त्रिपरिषद् राज्य रूपी रथ के दो चक्र हैं, इसीलिए मन्त्रिपरिषद् का अधिकार राजा के बराबर ही है। मन्त्रिपरिषद् राजा की शक्ति पर नियन्त्रण रख उसे मनमानी करने से रोकती थी। 4. राजा का व्यक्तित्व और उसकी शिक्षा – राजा का व्यक्तित्व तथा उसे प्रदान की गयी शिक्षा भी कौटिल्य के राजा की निरंकुशता पर अत्यन्त प्रभावशाली प्रतिबन्ध है। कौटिल्य ने राजा के लिए अनेक गुण आवश्यक बताये हैं और ऐसा सर्वगुणसम्पन्न राजा अपने स्वभाव से निरंकुश नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त कौटिल्य ने राजा की शिक्षा पर बल देकर उस पर ऐसे संस्कार डालने चाहे हैं कि वह लोकहित के कार्यों में लगा रहे। श्री कृष्णराव ने ठीक ही कहा है कि “कौटिल्य का राजा अत्याचारी नहीं हो सकता, चाहे वह कुछ बातों में स्वेच्छाचारी रहे, क्योंकि वह धर्मशास्त्र और नीतिशास्त्र के सुस्थापित नियमों के अधीन रहता है।”
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