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मनुष्य का हृदय बड़ा ममत्वप्रेमी है । कैसी भी उपयोगी और कितनी ही सुन्दर वस्तु क्यों न हो जब तक मनुष्य उसे पराई समझता है तब तक उससे प्रेम नहीं करता । किन्तु भद्दी से भद्दी और बिल्कुल काम में न आनेवाली वस्तु को भी यदि मनुष्य अपनी समझता है तो उससे प्रेम करता है । पराई वस्तु कितनी मूल्यवान क्यों न हो उससे नष्ट होने पर मनुष्य कुछ भी दुःख अनुभव नहीं करता, इसलिए कि वह वस्तु उसकी नहीं, पराई है ।अपनी वस्तु कितनी भही हो, काम में आनेवाली न हो उसके नष्ट होने पर मनुष्य को दुख होता है । कभी-कभी ऐसा भी होता है, कि मनुष्य पराई चीज से प्रेम करने लगता है । ऐसी दशा में भी जबतक मनुष्य उस वस्तु को अपनी बना कर नहीं छोड़ता अथवा अपने ह्रदय में यह विचार दृढ़ नहीं कर लेता कि यह वस्तु मेरी है तब तक उसे सन्तोष नहीं होता । ममत्व से प्रेम उत्पन्न होता है और प्रेम से ममत्य ।1. इस गद्यखण्ड का उचित शीर्षक लिखिए ।2. मनुष्य का हृदय कैसा होता है ?3. पराई वस्तु के प्रति मनुष्य का विचार कैसा होता है ?4. मनुष्य को दुःख का अनुभव कब नहीं होता है ?5. मनुष्य दूसरी वस्तु को अपना कब समझता है ?

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1. इस गद्य-खण्ड का उचित शीर्षक ममत्व और प्रेम है ।

2. मनुष्य का हृदय ममत्व प्रेमी होता है ।

3. पराई वस्तु से मनुष्य प्रेम नहीं करता है ।

4. मनुष्य जब तक वस्तु को पराई समझता है ।

5. मनुष्य जब तक दूसरी वस्तु से प्रेम करने लगता है तब उसे अपना समझता है ।



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