1.

मोकों कहाँ ढूँढे बंदे, मैं तो तेरे पास में।ना मैं देवल ना मैं मसजिद, ना काबे कैलास में।ना तो कौने क्रिया-कर्म में, नहीं योग बैराग में।खोजी होय तो तुरते मिलिहौं, पल भर की तालास में।कहैं कबीर सुनौ भई साधो, सब स्वाँसों की स्वाँस में।।भावार्थ : मनुष्य ईश्वर को पाने के लिए तरह-तरह के क्रिया-कर्म करता है, परन्तु उसे ईश्वर के दर्शन नहीं होते हैं। कबीर के अनुसार स्वयं निराकार ब्रह्म मनुष्य से कहते हैं कि हे मनुष्य ! तुम मुझे ढूँढ़ने के लिए कहाँ-कहाँ भटक रहे हो। मैं किसी मंदिरमस्जिद में तुम्हें नहीं मिलूँगा, और न किसी तीर्थस्थान पर। मैं किसी बाह्याडंबर से भी नहीं मिल सकता। योगी और बैरागी बनकर भी तुम मुझे नहीं पा सकते हो। जो मुझे सच्चे मन से खोजता है, उसे मैं तुरंत मिल जाता हूँ क्योंकि मैं तो प्रत्येक प्राणी की हर साँस में बसा हूँ। अतः अन्यत्र भटकने के बदले अपने मन में खोजो।1. क्रिया-कर्म से कबीर का क्या तात्पर्य है ?2. मनुष्य जीवनभर ईश्वर को कहाँ ढूँढता रहता है ?3. ईश्वर को पलभर में कौन प्राप्त कर सकता है ?4. कबीर ने किन बातों पर विशेष बल दिया है ?

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1. क्रिया-कर्म से तात्पर्य पूजा, जप, तप, हवन या अन्य किसी भी प्रकार के कर्मकांड से है।

2. मनुष्य जीवनभर ईश्वर को मंदिर, मस्जिद गुरुद्वारे जैसे धार्मिक स्थलों तथा काबा-काशी-कैलाश जैसे तीर्थस्थलों में ढूँढ़ता रहता है। वह कभी योग-साधना जैसी क्रियाएँ करता है तो कभी वैराग्य धारण करके ईश्वर को खोजता है।

3. खोजी व्यक्ति अर्थात् जो सच्चे मन से प्रभुभक्ति करता है, वह ईश्वर को पलभर में ही प्राप्त कर सकता है।

4. कबीर ने ईश्वर को अपने भीतर ही खोजने पर बल दिया है। उनका कहना है कि ईश्वर को मंदिर, मस्जिद या तीर्थस्थलों पर नहीं पाया जा सकता है।



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