1.

मुद्रा का कार्य देकर उसके कार्यों को संक्षिप्त में वर्णन कीजिए ।

Answer»

मार्शल के अनुसार : “किसी भी समय और किसी भी स्थान पर बिना किसी संदेह एवं जाँच पड़ताल के वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय हो सकता हो तो उसे मुद्रा कहते हैं ।
रोबर्टस के मतानुसार : ‘वस्तुओं और सेवाओं के बदले में जो सर्वस्वीकृत हो वह मद्रा है ।’
मुद्रा की एक उपयुक्त एवं पूर्ण परिभाषा : ‘मुद्रा वह वस्तु है जिसे एक व्यापक क्षेत्र में विनिमय के माध्यम, मूल्यमापक ऋण भुगतान और मूल्य संचय के रूप में स्वतंत्र एवं सामान्य स्वीकृति प्राप्त हो ।’

सामान्य अर्थ में ‘मुद्रा वह है जो मुद्रा का कार्य करें ।’ मुद्रा को समझने के लिए उसके कार्यों को समझेंगे :

मुद्रा के प्रमुख कार्य हैं :
(1) विनिमय का माध्यम
(2) मूल्य का मापदण्ड
(3) मूल्य के संग्रह के रूप में
(4) दीर्घकालीन भुगतान के साधन के रूप में ।

अब इन मुद्रा के कार्यों की चर्चा करेंगे :

(1) विनिमय का माध्यम : मुद्रा का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य विनिमय का माध्यम के रूप में होता है । मुद्रा अपने आर्थिक व्यवहारों को सरल बनता है और वस्तु विनिमय पद्धति में आवश्यकताओं के परस्पर समन्वय में जो परेशानी पड़ती थी उसे मुद्रा ने दूर कर दिया । किसान गेंहू को बेचकर मुद्रा प्राप्त करता है । और फिर मुद्रा देकर चावल, कपड़े, घी आदि खरीद सकता है । व्यक्ति मुद्रा खर्च करके वर्तमान में वस्तु और सेवाएँ प्राप्त करते हैं । बचत करके भविष्य में वस्तु और सेवाएँ खरीद सकते हैं । मूलभूत भय से आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उपयोगी वस्तुएँ और सेवाएँ खरीदने के लिए मुद्रा का माध्यम के रूप में उपयोग होता है ।

इस प्रकार सर्वस्वीकृत माध्यम के रूप में मुद्रा अर्थतंत्र में अति महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है ।।

(2) मूल्य के मापदण्ड के रूप में कार्य : मुद्रा मूल्य के मापदण्ड के रूप में महत्त्वपूर्ण कार्य करता है । वस्तु विनिमय प्रथा में प्रत्येक वस्तु के विनिमय मूल्य को याद रखना पड़ता था । एक मन गैंहू बराबर कितने मन चाबल ? कितने मीटर कपड़े ? कितने किलो घी, कितनी जोड़ी चप्पल ? आदि । मुद्रा इस बात को सरल बनाता है । जब से मुद्रा विनिमय का सर्वस्वीकृत माध्यम बना है । मुद्रा के कारण कीमतों का तंत्र काम करता है और प्रत्येक वस्तु और सेवा की कीमत निश्चित होती है परिणाम स्वरूप मूल्य की गणना सरल बनती है । मुद्रा के मूल्य से तुलनात्मक अध्ययन सरल बनता है । शीघ्रता से निर्णय ले सकते हैं ।

(3) मूल्य के संग्रह के रूप में कार्य : वस्तु विनिमय प्रथा में वस्तु का संग्रह करने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं था । आकस्मिक समय में द्रव्य की अनुपस्थिति में कई समस्याएँ सामने आती रही । नाशवान वस्तुओं का लंबे समय तक संग्रह कर पाना मुश्किल था । लंबे समय तक नाशवान वस्तुओं का संग्रह करने से मूल्य का नाश होता है । वस्तुओं के रूप में (मुद्रा का) संग्रह करने पर, वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने की समस्या भी सामने आयी । मुद्रा की खोज़ से उपरोक्त परेशानियाँ समाप्त हो गयी । मुद्रा को लंबे समय तक संग्रह किया जा सकता है । मुद्रा के सड़ने या बिगड़ जाने की संभावना नहीं होती । द्रव्य को एक स्थान से दूसरे स्थान पर आसानी से ले जाया जा सकता है ।

आकस्मिक परिस्थिति से निपटने के लिए लोग द्रव्य की बचत भी करते हैं । विकट परिस्थिति में द्रव्य लोगों के काम आने के कारण मूल्य के संग्राहक के रूप में लोग द्रव्य की बचत करते हैं । बचत का अर्थतंत्र में पूंजीनिवेश होता है । पूँजीनिवेश से अर्थतंत्र का विकास होता है । अतः द्रव्य मूल्य के संग्राहक के रूप में द्रव्य अर्थतंत्र में अतिमहत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है ।

(4) द्रव्य दीर्घकालीन भुगतान के रूप में : द्रव्य दीर्घकालीन लेन-देन में बहुत ही उपयोगी है । वस्तुविनिमय प्रथा में वस्तु के रूप में लेन-देन में कई समस्याएँ आती थी । मानलीजिए कोई किसान अन्य किसान के पास से 50 किग्रा बाज़री ले आता है और एक साल पश्चात् उसे लौटाता है । यह संभव है कि एक साल बाद जब किसान बाज़री लौटाता है तब बाज़री की कीमत कम हो और उसकी किस्म भी खराब हो । इस प्रकार वस्तुविनिमय प्रथा में दीर्घकालीन भुगतान में कई समस्याएँ सामने आती, द्रव्य का आसानी से संग्रह किया जा सकता है । द्रव्य की कीमत लगभग स्थिर रहने से द्रव्य के रूप में किया गया भुगतान लोगों को स्वीकार्य होता है ।

द्रव्य के उपरोक्त कार्यों के कारण आधुनिक अर्थव्यवस्था में द्रव्य की बचत द्वारा पूंजीनिवेश होता है । पूँजीनिवेश से अर्थतंत्र का विकास होता है । “मुद्रा के हैं चार कार्य : माध्यम, माप, मान और भण्डार । यदि इससे काम न सरे तो हस्तान्तरण को आगे करें ।”



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