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मुद्रा की मांग और मुद्रा की आपूर्ति की संकल्पना समझाइए । उनके मुख्य घटक कौन-कौन से है ?

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मुद्रा की माँग : मुद्रा द्वारा लोग अपनी आवश्यक्ताओं की पूर्ति करते है, जिसका उपयोग वे चीजवस्तुओं और सेवाओं की खरीदी के लिए करते हैं । क्योंकि मुद्रा सीधे तौर पर लोगों की कोई आवश्यकता पूरी नहीं करती । जैसे – भूख मिटाने हेतु मुद्रा को खाया नहीं जा सकता एवं प्यास बुझाने हेतु मुद्रा को पिया नहीं जा सकता, फिर भी लोग मुद्रा को हाथ में नकद रूप में रखना पसंद करते है । क्योंकि मुद्रा के द्वारा लोगों की कितनी ही आवश्यकताओं की पूर्ति होती है । महान अर्थशास्त्री कीन्स ने बताया कि मुद्रा की माँग के तीन उद्देश्य हैं :
(1) विनिमय का उद्देश्य
(2) सावधानी का उद्देश्य
(3) सट्टाकीय उद्देश्य

(1) विनिमय का उद्देश्य : यह तो सर्वविदित है, कि लोगों को आय कुछ समय के अंतर से प्राप्त होती है, जबकि खर्च प्रतिदिन करना पड़ता है । इसलिए दो आय प्राप्ति के बीच के समय में विविध खर्चों को पूरा करने के लिए लोगों को अपने पास नकद रूप में मुद्रा को रखना पड़ता है । ठीक इसी प्रकार व्यापारिक संस्थाओं को भी कछ मुद्रा इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए नकदी स्वरूप में रखना पड़ता है । ठीक इसी प्रकार व्यापारिक संस्थाओं को भी कुछ मुद्रा इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए नकदी स्वरूप में रखना पड़ता है । नकद मुद्रा की उतने अंश तक होनेवाली माँग को विनिमय के उद्देश्य से नकद मुद्रा की माँग कहते हैं ।

(2) सावधानी का उद्देश्य : भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु लोग नकद मुद्रा की माँग करते हैं । उदाहरण स्वरुप – किसी भी प्रकार की दुर्घटना या बीमारी होने पर विविध प्रकार के खर्च जब आकस्मिक रूप में आ जाते है, तो उनकी पूर्ति के लिए लोग मुद्रा को नकद रूप में रखते हैं । व्यापारिक संस्थाएँ भी व्यापार धंधे में आनेवाले आकस्मिक खर्च की पूर्ति करने के उद्देश्य से मुद्रा की माँग करती है । ऐसा नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति या संस्था को भविष्य में ऐसा खर्च करना ही पड़े, परन्तु विकल्प के रूप में मुद्रा उसे एक प्रकार का आश्वासन देती है ।

(3) सट्टाकीय उद्देश्य : कीन्स ने प्रतिभूतियों के संदर्भ में होनेवाली सट्टाकीय हेतु मुद्रा की माँग को प्रस्तुत किया था । सट्टा अर्थात् भविष्य में भावों के अपेक्षित परिवर्तन का लाभ लेने हेतु वर्तमान में प्रतिभूतियों का क्रय-विक्रय । इन प्रतिभूतियों का क्रय-विक्रय करके उसमें से लाभ प्राप्त करने हेतु सटोरियें जो मुद्रा नकद रूप में अपने पास रखते है, उसे सट्टाकीय हेतु मुद्रा की माँग कहते हैं । ब्याज की दर और प्रतिभूतियों के भावों के बीच व्यस्त संबंध होता है । ब्याज की दर बढ़ने की अपेक्षा हो तो प्रतिभूतियों के भाव घटेंगे ऐसा अनुमान लोग लगाते है । इसलिए वर्तमान ऊँचे भाव से प्रतिभूतियों को बेचकर लोग नकद मुद्रा अपने पास रखने को प्रेरित होते हैं।

मुद्रा की आपूर्ति :

परम्परागत व्याख्या के अनुसार मुद्रा की आपूर्ति अर्थात् लोगों के पासवाली मुद्रा, चाहे वह उनकी जेब में हो, तिजोरी में हो या . बैंकों में जमाराशि के रूप में हो । लोग इस मुद्रा को अपनी इच्छानुसार खर्च कर सके ऐसा होना चाहिए । इस प्रकार मुद्रा के दो घटक हैं ।

(1) मध्यस्थ बैंक द्वारा और ट्रेजरी द्वारा निर्गमित चलनी नोंटे ।
(2) बैंक में लोगों की चालू जमाराशियाँ जो माँगने पर निकाली जा सकें ।

किसी निश्चित समयावदि में मुद्रा का भंडार जो खर्च किया जा सके, उस रूप में नहीं होता । उदाहरण के तौर पर बैंक की सावधि जमा को मुद्रा की आपूर्ति नहीं कहते । मुद्रा की आपूर्ति की व्याख्या वर्तमान में विस्तृत कर दी गई है और अब बैंकों की चालू जमाराशि के अतिरिक्त अन्य जमाराशि का भी समावेश मुद्रा की आपूर्ति में किया जाता है । मुद्रा आपूर्ति की विस्तृत व्याख्या में जिन आर्थिक सम्पत्तियों का रूपान्तरण मुद्रा में हो सकता हो, उनका समावेश भी कई बार मुद्रा की आपूर्ति में किया जाता है ।

चलनी नोटों को निर्गमित करने का अधिकार अपने देश में सिर्फ रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया को है ।

रिजर्व बैंक द्वारा जो चलनी नोटें निर्गमित की जाती है, वे उसका ऋण और उत्तरदायित्व है । चलनी नोटों में रिजर्व बैंक के . गवर्नर के हस्ताक्षरवाली इस आशय की लिखावट होती है कि उसके सामने उतने ही अंशों की मान्य सम्पत्ति उसके पास होनी चाहिए । इन सम्पत्तियों में स्वर्ण, विदेशी मुद्रा, सरकारी प्रतिभूतियाँ बॉण्ड तथा विनिमय पत्रों का समावेश होता है ।

मुद्रा की आपूर्ति के घटकों में परिवर्तन होने से मुद्रा की आपूर्ति में भी परिवर्तन होता है । जब चलनमुद्रा और बैंक मुद्रा के भंडार (जत्थे) में वृद्धि होती है, तब मुद्रा की आपूर्ति में वृद्धि होती है । इन दोनों का प्रमाण प्रत्येक देश में उसके आर्थिक विकास की कक्षा और मुद्रा पद्धति के विकास पर आधारित है ।

विकासशील देशों में सामान्य रूप से मुद्रा की कुल आपूर्ति में चलन मुद्रा का प्रमाण अधिक होता है । जैसे-जैसे अर्थतंत्र विकसित होता है, वैसे-वैसे बैंक में मुद्रा का प्रमाण भी बढ़ता जाता है । भारत में प्रचलित प्रथा के अनुसार चलन के न्यूनत्तम रक्षित कोष के रूप में रु. 200 करोड़ मूल्य का सोना तथा विदेशी मुद्रा होना अनिवार्य है । जिसमें कुछ निश्चित रकम के रूप में स्वर्ण होना आवश्यक है । परन्तु वर्तमान समय में इस प्रथा का विशेष प्रयोजन नहीं है ।

भारत में अगस्त, 2003 में चलन घटक के तौर पर चलनी नोटें रु. 2,84,226 करोड़ थी । वहीं पर जमाराशि के तौर पर बैंक जमाराशि का प्रमाण रु. 15,33,778 करोड़ था । अर्थात् चलन घटक से 5.39 गुना अधिक जमाराशि घटक का प्रमाण था । मुद्रा की आपूर्ति यदि बढ़ जाए तो उससे भाववृद्धि जैसे समस्याएँ उत्पन्न होती है । इसलिए रिजर्व बैंक मुद्रा की आपूर्ति पर नियंत्रण रखता है।



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