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मुगलकाल में साहित्य एवं चित्रकला के विकास पर प्रकाश डालिए।

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मुगलकाल में साहित्य का विकास- मुगल शासनकाल साहित्यिक दृष्टि से प्रगतिशील था। इस काल में फारसी, हिन्दी, संस्कृत, उर्दू तथा अन्य सभी प्रकार के साहित्य का विकास हुआ। मुगल सम्राटों ने साहित्य की प्रगति में योगदान दिया और इसे संरक्षण प्रदान किया। इस काल के साहित्यिक विकास को निम्न रूप में अभिव्यक्त किया जा सकता है

1. फारसी साहित्य – मुगलों के समय में फारसी राजभाषा बन गई थी। अकबर के शासनकाल तक फारसी का ज्ञान इतना फैल चुका था कि अब राजस्व के दस्तावेज फारसी के साथ-साथ स्थानीय भाषा (हिन्दी) में भी रखने की जरूरत खत्म हो गई। प्रथम मुगल सम्राट बाबर स्वयं तुर्की और फारसी का विद्वान था। उसने अपनी आत्मकथा ‘तुजुके-बाबरी’ अथवा बाबरनामा’ की रचना तुर्की में की। एल्फिंस्टन के अनुसार बाबर की यह जीवनी ही सारे एशिया में वास्तविक ऐतिहासिक सामग्री है। बाबर का कविता संग्रह ‘दीवान’ (तुर्की) बहुत प्रसिद्ध हुआ। हुमायूं मुगल शासकों में अत्यन्त शिक्षित था। वह न केवल तुर्की तथा फारसी साहित्य का अच्छा ज्ञाता था अपितु दर्शन, गणित आदि का भी ज्ञाता था। दुर्भाग्यवश वह साहित्यिक प्रोत्साहन को विशेष योगदान नहीं दे सका।

अकबर का काल सांस्कृतिक प्रगति के साथ-साथ साहित्यिक पुनरुत्थान का भी युग था। मौलिक रचनाओं के साथ-साथ अनुदित रचनाएँ भी बाहुल्यता में प्रकाश में आईं। अकबर के शासनकाल के दौरान अबुल फजल का ‘अकबरनामा’ और ‘आइने-अकबरी’, निजामुद्दीन अहमद का ‘तबकाते अकबरी’, गुलबदन बेगम का ‘हुमायूँनामा’, अब्बास सरवानी का ‘तौफीक-ए-अकबरशाही’, बदायूँनी का मुन्तखब-उत-तवारीख’, अहमद यादगार का ‘तारीखे सलातीने अफगाना’, बयाजिद सुल्तान का ‘तारीखे हुमायूँ और फैजी सरहिन्दी का ‘अकबरनामा’ आदि प्रमुख ग्रन्थ हैं। इस काल में अकबर के प्रोत्साहन से महाभारत का अनुवाद ‘रज्यनामा’ नाम से नकीब खाँ, बदायूँनी, अबुल फजल, फैजी आदि के सम्मिलित प्रयत्नों से फारसी में किया गया। बदायूँनी ने रामायण का अनुवाद किया। उसने अथर्ववेद का अनुवाद आरम्भ किया और उसको हाजी इब्राहिम सरहिन्दी ने पूरा किया। ‘लीलावती’ का अनुवाद फैजी ने किया। राजतरंगिणी का अनुवाद शाह मुहम्मद शाहाबादी ने, कालियदमन का अबुल फजल ने और नल-दमयन्ती का फैजी ने अनुवाद किया।

2. हिन्दी साहित्य – मुगलकाल में फारसी साहित्य के समान हिन्दी साहित्य की भी खूब उन्नति हुई। यद्यपि अकबर से पूर्व हिन्दी साहित्य का विकास प्रारम्भ हो चुका था और ‘पद्मावत’ तथा ‘मृगावत’ जैसे उच्चकोटि के ग्रन्थों की रचना हो चुकी थी तथापि अकबर की सहिष्णु नीति से हिन्दी साहित्य अत्यन्त समृद्ध हुआ। राजा बीरबल, राजा मानसिंह, राजा भगवानदास, नरहरि और हरिनाथ अकबर के राजदरबार से सम्बन्धित विद्वान थे। नन्ददास, विट्ठलनाथ, परमानन्ददास, कुम्भनदास आदि कवियों ने व्यक्तिगत प्रयत्नों से हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाया। इस काल में तुलसीदास ने लगभग 25 ग्रन्थों की रचना की, जिनमें ‘रामचरितमानस’ और ‘विनय पत्रिका प्रमुख हैं। सूरदास ने ‘सूरसागर’, रहीम ने ‘रहीम सतसई और रसखान ने प्रेमवाटिका’ नामक काव्य ग्रन्थों की रचना की।
मीराबाई के भजन भी हिन्दी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। अकबर का समय हिन्दी साहित्य का स्वर्णकाल था। जहाँगीर के दरबार में राजा सूरजसिंह, अगरूप गोसाई और बिशनदास जैसे हिन्दी के विद्वान थे। जहाँगीर का भाई दानियाल हिन्दी में कविता करता था। शाहजहाँ के संरक्षण में सुन्दर कविराय, सेनापति, कविन्द्र आचार्य, शिरोमणि मिश्र, बनारसीदास आदि हिन्दी के विद्वान थे। इनके अतिरिक्त अहमदाबाद के दादू ने, जिन्होंने दादू-पन्थी सम्प्रदाय को प्रारम्भ किया, अनेक धार्मिक कविताओं की रचना की। हिन्दी के महान् कवि बिहारी को राजा जयसिंह का संरक्षण प्राप्त हुआ था। इसी समय में केशवदास ने कविप्रिया, रसिकप्रिया और रामचन्द्रिका की रचना की। औरंगजेब ने हिन्दी को संरक्षण नहीं दिया।

3. संस्कृत साहित्य – मुगलकाल में संस्कृत साहित्य की श्रेष्ठ मौलिक रचनाओं का अभाव रहा, परन्तु तब भी संस्कृत भाषा की स्थिति दिल्ली सुल्तानों के काल से अच्छी रही। अकबर ने संस्कृत को राज्याश्रय प्रदान किया। ‘पारसी प्रकाश’ नामक संस्कृत व फारसी का कोष इसी समय लिखा गया। महेश ठाकुर ने अकबर के समय का संस्कृत में इतिहास लिखा। जैन विद्वानों में पद्मसुन्दर कृत ‘अकबरशाही शृंगार-दर्पण’, सिद्धचन्द्र उपाध्याय कृत ‘भानुचन्द चरित्र’, देव मिलन कृत ‘हीर सौभाग्यम्” आदि महत्वपूर्ण संस्कृत ग्रन्थ हैं। संस्कृत के महान् पण्डित कवीन्द्र आचार्य सरस्स्वती और पण्डित जगन्नाथ शाहजहाँ के राजकवि थे। शाहजहाँ के दरबार में अनेक संस्कृत कवि अपनी कविताओं पर पुरस्कार प्राप्त करते थे। औरंगजेब और उसके उत्तराधिकारियों ने संस्कृत को न तो संरक्षण दिया और न प्रोत्साहन।

4. उर्दू साहित्य – अमीर खुसरो पहला विद्वान था, जिसने उर्दू भाषा को अपनी कविताओं का माध्यम बनाया। उसके पश्चात् सूफी सन्तों और भक्ति मार्ग के कुछ सन्तों ने भी अपने विचारों के प्रचार के लिए इसका प्रयोग किया तथा इसे लोकप्रिय बनाने में सहायता दी, परन्तु उर्दू को किसी भी तुर्क अथवा शक्तिशाली मुगल बादशाहों ने सरंक्षण नहीं दिया। मुहम्मदशाह (1719-1748 ई०) पहला बादशाह था, जिसने उर्दू को प्रोत्साहन दिया। उसने प्रसिद्ध कवि शम्सुद्दीन वली को दरबार में सम्मान दिया। इसके पश्चात् उर्दू का विकास होता गया और उर्दू दिल्ली तथा उत्तर प्रदेश में पर्याप्त लोकप्रिय हो गई। उन्नीसवीं सदी में अंग्रेजों ने भी उर्दू को प्रोत्साहन दिया।

5. बंगला साहित्य – बंगला साहित्य का उत्थान भी इस युग में सम्भव हो सका। बंगाल में चैतन्य महाप्रभु द्वारा प्रसारित कृष्णभक्तिमार्गी अनेक सन्त भक्तों ने भजन, पद तथा गीत निर्मित किए। चैतन्य के जीवन-चरित्र पर अनेक ग्रन्थ लिखे गए, जिन्होंने बंगाल के निवासियों को भगवत् प्रेम तथा उदारता की भावना से ओत-प्रोत कर दिया। इस समय कई महाकाव्यों तथा ‘भागवत्’ का बंगला भाषा में अनुवाद किया गया तथा चण्डी देवी और मनसा देवी पर ग्रन्थों की रचनाएँ हुई। काशी, रामदास, जयचन्द (चैतन्य चरितामृत) और मुकुन्दराम चक्रवर्ती (कवि-कंकन-चण्डी) इस युग के प्रमुख विद्वान थे।

6. मराठी साहित्य – इस समय का मराठी साहित्य भी धार्मिक एवं भक्ति की भावनाओं से ओत-प्रोत है। प्रारम्भ में ‘रामायण’, ‘महाभारत’ तथा ‘भागवत्’ को आधार मानकर कुछ ग्रन्थों की मराठी में रचना की गई, जिनमें ‘हरि-विजय’, ‘राम विजय’, ‘शिवलीलाकृत’ आदि प्रमुख हैं। इस काल के मराठी विद्वानों में रघुनाथ पण्डित’, ‘मुक्तेश्वर’ तथा ‘समर्थ गुरु रामदास प्रमुख हैं। रामदास भक्त, कवि एवं उपदेशक थे, जिन्होंने राष्ट्रप्रेम की भावनाएँ प्रसारित की। इनका प्रमुख ग्रन्थ ‘दास-बोध’ है। तुकाराम भी इसी युग की विभूति हैं, जिनके भक्ति से ओत-प्रोत पद मराठी साहित्य की अमूल्य निधि हैं।

7. गुजराती साहित्य – हिन्दी, बंगला तथा मराठी भाषाओं के समान गुजराती भाषा में भी इस समय उच्चकोटि के साहित्यिक ग्रन्थों की रचना की गई। गुजरात के प्रसिद्ध कवि अरबा ने अकबर के काल में ‘चित-विचार’, ‘संवाद-शतपद’, ‘कैवल्य गीता’ आदि अनेक ग्रन्थों की रचना की। तदुपरान्त प्रेमानन्द ने भक्ति रस के पदों से गुजराती साहित्य में एक अपूर्व परिवर्तन ला दिया। उन्होंने 26 ग्रन्थों की रचना की तथा उनके पद आज भी गुजरात में लोकप्रिय हैं। इसके पश्चात सामल ने पौराणिक कथाओं का सुन्दर ढंग से वर्णन करने की ख्याति प्राप्त की। इनके अतिरिक्त वल्लभ’, ‘मुकुन्द’, ‘देवीदास’, ‘शिवदास’, ‘विष्णुदास’ आदि अन्य प्रसिद्ध कवि इस युग में उपन्न हुए।
8. पुस्तकालय – मुगल बादशाहों को हस्तलिखित पुस्तकें संकलित करने में विशेष अभिरुचि थी। हुमायूँ ने लाहौर में एक पुस्तकालय बनवाया, जिसकी सीढ़ियों से गिरकर उसकी मृत्यु हुई। अकबर ने पुस्तकालय में 24,000 हस्तलिखित पुस्तकों का संग्रह किया था, जिनमें अनेक पुस्तकों में सुन्दर-सुन्दर चित्र अंकित थे। जहाँगीर तथा शाहजहाँ ने भी अपने महान् पूर्वजों का अनुसरण करते हुए पुस्तकालय में महत्वपूर्ण ग्रन्थों का संग्रह करवाया था।

मुगलकाल में चित्रकला का विकास – भवन निर्माण कला के समान ही चित्रकला को भी मुगल सम्राटों ने राज्याश्रय प्रदान किया तथा इस समय चित्रकला का चरम् विकास हुआ। भारत में प्राचीनकाल से ही हिन्दू राजाओं के दरबारों में चित्रकला को प्रोत्साहन मिलता रहा था तथा उस समय के भित्तिचित्र तथा मनुष्यों के चित्र आज भी दर्शनीय हैं, परन्तु सल्तनत काल में मुस्लिम सुल्तानों ने चित्रकला को प्रोत्साहित नहीं किया अपतुि फिरोज तुगलक ने तो दीवारों पर चित्र बनाने अथवा मनुष्यों के चित्र बनाने पर प्रतिबन्ध भी लगा दिया था, अतः सल्तनत काल में चित्रकला नष्ट हो गई। मुगलकाल में उसका पुनरुत्थान हुआ। इस समय भारतीय तथा ईरानी चित्रकला का सुन्दर सम्मिश्रण हुआ।

1. बाबर और हुमायूँ – बाबर अपने पूर्वजों के समान चित्रकला का शौकीन था तथा उसने चित्रकला को प्रोत्साहित किया। वह प्रकृति का प्रेमी था तथा उसकी आत्मकथा ‘तुजुके-बाबरी’ इस बात की पुष्टि करती है कि प्राकृतिक रमणीय दृश्यों को देखकर वह कितना आनन्दित हो उठता था। परन्तु उसके काल के विशेष चित्र इस समय उपलब्ध नहीं हैं। उसके उत्तराधिकारी हुमायूँ को भी चित्रकला का शौक था तथा ईरान से लौटते समय वह अपने साथ दो ईरानी चित्रकारों मीर सैयद अली तबरीजी और ख्वाजा अब्दुल समद को भारत लाया था। हुमायूं का निर्वासन के दौरान सफाविद दरबार में सर्वप्रथम फारसी कला से परिचय हुआ। वहाँ के शासक तहमास्प ने फारसी कला को अत्यधिक प्रश्रय दिया लेकिन वह धीरे-धीरे कट्टरवाद की ओर अग्रसर हो गया।

2. अकबर – अकबर को चित्रकला से विशेष अनुराग था तथा उसके दरबार में लगभग सौ हिन्दू तथा मुसलमान चित्रकार रहते थे। इनमें अब्दुल समद, फारुख बेग, जमशेद, दशवन्त, बसावन, मुकुन्द, लालगेसू, हरिवंश, जगन्नाथ, भवानी तथा धर्मराज प्रमुख चित्रकार थे। उसके दरबार के 17 प्रमुख चित्रकारों में अधिकतर हिन्दू ही थे तथा ईरानी अथवा विदेशी कलाकारों की संख्या बहुत कम थी। विदेशी चित्रकारों में मीर सैयद अली, अब्दुल समद, अकारिजा और फर्रुखबेग मुख्य थे। अकबर ने चित्रकला में भी देशी तथा विदेशी तत्वों का सुन्दर सम्मिश्रण करने में सफलता प्राप्त की तथा उसके काल की कला पूर्णतः भारतीय थी। अकबर ने जफरनामा, चंगेजनामा, कालियादमन, रज्मनामा, नल-दमयन्ती तथा रामायण के चित्रों का निर्माण करवाया। फतेहपुर सीकरी की दीवारों पर उसने सुन्दर चित्रकारी करवाई। दरबार में साप्ताहिक प्रदर्शनियों की व्यवस्था करके तथा पुरस्कार प्रदान करके उसने चित्रकला को प्रोत्साहन दिया। उसने चित्रकारों को उच्च मनसब प्रदान किए तथा उनके लिए चित्रशालाओं की व्यवस्था की।

3. जहाँगीर – नि:सन्देह मुगल चित्रकला का स्वर्ण-युग जहाँगीर का काल माना जाता है। जहाँगीर स्वयं चित्रकार था तथा प्रकृति के दृश्यों से उसे अगाध प्रेम था। वह चित्रकला की सूक्ष्म वृत्तियों से परिचित था तथा चित्रकारों का ध्यान उनकी त्रुटियों की ओर आकर्षित करता रहता था। कहा जाता है कि वह चित्र देखकर चित्रकार का नाम बतला सकता था। उसके काल में पौधों, वृक्षों, पुष्पों तथा पशु-पक्षियों के चित्र निर्मित हुए। प्राकृतिक दृश्यों को भी अनेक चित्रकारों ने अपनी तूलिका से विविध रंगों एवं आकृतियों में चित्रित किया।
जहाँगीर के काल में चित्रकारी पुष्ट तथा परिपक्व होकर पूर्णता को प्राप्त हुई। सम्राट को भारतीय चित्रकला की शैली पसन्द थी तथा उसने ईरानी प्रभाव से चित्रकला को मुक्त किया तथा विदेशी तत्वों का भारतीय शैली से सुन्दर सामंजस्य स्थापित किया। इस प्रकार जहाँगीर का काल मुगल चित्रकला का स्वर्ण-युग था। इस समय चित्रकला में नवीनता, मौलिकता, स्वाभाविकता, गतिशीलता तथा सजीवता थी। प्राकृतिक दृश्यों का सूक्ष्म, भावपूर्ण तथा स्वाभाविक चित्रण एवं व्यक्ति चित्र और युद्धों व आखेट के दृश्य चित्रों का निर्माण इस कला की विशेषता थी। इस समय के चित्रकारों में उस्ताद मंसूर, आगार खाँ, फारुखबेग, मुहम्मद नादिर, केशव, बिशनदास, मनोहर, माधव, गोवर्धन, तुलसी आदि प्रमुख थे। लेकिन पर्सी ब्राउन के अनुसार- “जहाँगीर के निधन के साथ ही मुगल चित्रकला की आत्मा विलीन हो गई।

4. शाहजहाँ – वैसे तो शाहजहाँ के काल में भी चित्रकला को प्रोत्साहन मिला, परन्तु शाहजहाँ को चित्रकला से उतना प्रेम नहीं था, जितना भवन निर्माण कला से। उसके काल में चित्रकला अलंकरण से युक्त होकर अपनी मौलिकता तथा सजीवता को खो बैठी। शाहजहाँ ने रंगो के स्थान पर बहमल्य पत्थरों का प्रयोग आरम्भ करवाया। उसके द्वारा निर्मित भवनों में चित्रकला शाही वैभव को प्रदर्शित करती है, जिसमें स्वर्ण तथा बहुमूल्य रत्नों का अत्यधिक प्रयोग किया गया है, परन्तु इस समय चित्रकला का धीरे-धीरे पतन आरम्भ होने लगा। इस काल के चित्र नीरस तथा भाव विहीन हैं, जिनमें केवल रंगों को प्रधानता दी गई है। शाहजहाँ ने अपने शासनकाल के 8वें वर्ष में अपने शासन के आधिकारिक इतिहास ‘पादशाहनामा’ लिखने का आदेश दिया था, जिसके मूल पाठ के साथ दिए गए चित्र दरबारी समारोहों और महत्वपूर्ण घटनाओं का चित्रण करते हैं।

इस समय के चित्रों का प्रमुख विषय सामन्ती दरबार के दृश्यों तथा रत्नजड़ित वस्त्राभूषण आदि का प्रदर्शन मात्र रह गया था, जिसमें कला की सूक्ष्मता का सर्वथा अभाव था। शाहजहाँ के काल के व्यक्ति चित्र (Portraits) वास्तव में अत्यन्त सुन्दर, सजीव तथा भावपूर्ण थे। भावव्यंजना, मुख मुद्रा तथा आन्तरिक अभिव्यक्ति में ये चित्र श्रेष्ठ थे, परन्तु इन चित्रों की माँग बढ़ने पर व्यक्ति चित्र के स्वतन्त्र चित्रण के स्थान पर उनकी प्रतिकृतियाँ बनाई जाने लगीं, जिन्होंने कला को निम्न स्तर पर पहुंचा दिया। इसी प्रकार पशुओं के चित्रों में भी अस्वाभाविकता की झलक स्पष्ट दिखाई पड़ती है। शाहजहाँ के काल के

प्रमुख चित्रकार मीर हाशिम, मुहम्मद नादिर, विचित्र, चित्रमन, अनूप तथा चिन्तामणि थे।
मुगलकालीन चित्रकला की विशेषताएँ- मुगलकाल में चित्रकला के अनेक विषय थे, जैसे- आखेट, युद्ध, शाही राजसभा, सामन्तों के जीवन के दृश्य, पौराणिक कहानियों के विभिन्न दृश्य, व्यक्ति चित्र, पशु-पक्षियों, वृक्षों, पुष्पों तथा पौधों के चित्र आदि। ये चित्र हिन्दूकाल के चित्रों के समान धार्मिक भावनाओं पर आधारित नहीं थे। इन चित्रों को दरबारी चित्र कहा जा सकता है क्योंकि जनता की भावनाओं का चित्रण इनमें नहीं है।

मुगलकाल की चित्रकला शैली की दृष्टि से सजीव एवं स्वाभाविक है। धीरे-धीरे ईरानी कला के प्रभाव से मुक्त होकर वह पूर्णतया भारतीय हो गई। इसकी विशेषता रेखाओं की गोलाई और कोमलता, आकृतियों में गति और स्फूर्ति, हस्तमुद्राओं में सजीवता और उनके प्रयोग की बाहुल्यता है। इस समय के चित्रकारों ने चटकीले तथा रुपहले रंगों का खूब प्रयोग किया है। इस काल के व्यक्ति चित्रों में आकृति का अंकन अत्यन्त सूक्ष्म व स्वाभाविक है परन्तु मुगल वैभव तथा विकास की परिधि में
बँधी होने के कारण यह कला उन्मुक्त नहीं हो पाई, जिसके कारण इसमें एक प्रकार की कृत्रिमता तथा जड़ता उत्पन्न हो गई।



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