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मुगलकालीन वित्त-व्यवस्था पर निबन्ध लिखिए।

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मुगलकालीन वित्त-व्यवस्था का अध्ययन निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है

1. राज्य की आय के साधन – मुगल बादशाहों की आय के मुख्य साधन युद्ध में लूटी हुई सम्पत्ति का पाँचवाँ भाग, व्यापारिक कर, टकसाल, अधीनस्थ राजाओं एवं मनसबदारों से समय-समय पर प्राप्त होने वाले उपहार, लावारिस सम्पत्ति, नमक कर, राज्य के उद्योगों से आय और लगान (भूमिकर) था। बाबर और हुमायूँ ने हिन्दुओं से ‘जजिया’ और मुसलमानों से ‘जकात’ नामक धार्मिक कर लिए। अकबर ने इन्हें समाप्त कर दिया। औरंगजेब के समय में ये धार्मिक कर पुन: लगाए गए। अधिकांश उत्तरकालीन मुगल बादशाहों ने भी इन करों को लगाने का प्रयत्न किया।

2. लगान व्यवस्था – मुगल साम्राज्य की लगभग दो-तिहाई आय लगान ( भूमिकर) से होती थी, जो एक प्रकार से आर्थिक संगठन का मुख्य आधार थी। अकबर प्रथम मुगल बादशाह था, जिसने लगान-व्यवस्था को सुचारु रूप से स्थापित किया और मध्य युग की सर्वश्रेष्ठ लगान पद्धति का निर्माण किया। उसने विभिन्न लगान अधिकारियों तथा अर्थ-मन्त्रियों को नियुक्त करके विभिन्न अन्वेषण किए। उसने टोडरमल की सहायता से जिस लगान व्यवस्था को स्थापित किया, उसे दहसाला प्रबन्ध (जाब्ता) कहा जाता है और वह मुगल लगान-व्यवस्था का सफल आधार बनी।

3. दहसाला प्रबन्ध – 1580 ई० में अकबर ने दहसाला प्रबन्ध को आरम्भ किया और उसे लगान व्यवस्था का स्थायी स्वरूप दिया गया। उस समय राजा टोडरमल अर्थ मन्त्री था और उसका मुख्य सहायक ख्वाजा शाह मंसूर था। इस बन्दोबस्त की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार थीं⦁    सर्वप्रथम 

सम्पूर्ण राज्य की खेती योग्य भूमि की नाप करवाई गई। भूमि की नाप के लिए रस्सी की जरीब के स्थान
पर बॉस की जरीब का प्रयोग किया गया, जिसके टुकड़े लोहे की पत्तियों से जुड़े होते थे।
⦁    क्षेत्रफल की इकाई बीघा मानी गई, जो 60 गज x 60 गज अर्थात् 3600 वर्ग गज होता था।
⦁    नापने के लिए सिकन्दरी गज के स्थान पर अकबरी गज जो 41 अंगुल का था, प्रयोग किया गया।
⦁    कृषि योग्य भूमि को चार भागों में बाँटा गया-
⦁    पोलज
⦁    पड़ौती
⦁    छच्चर (चाचर) और
⦁    बंजर भूमि।
⦁    प्रत्येक प्रकार की भूमि की पिछले दस वर्षों की पैदावार का पता लगाकर उस भूमि की औसत पैदावार का पता लगाया जाता था और उस औसत पैदावार को लगान निश्चित करने का आधार मानकर अगले दस वर्षों के लिए किसानों से लगान निश्चित कर दिया जाता था।
⦁    इस व्यवस्था के अनुसार राज्य का हिस्सा उपज का 1/3 भाग होता था।
⦁    किसानों से लगान सिक्कों के रूप में लिया जाता था। अकबर ने किसानों को भूमि का स्वामी स्वीकार किया और राज्य के किसानों से सीधा सम्पर्क स्थापित किया। इस प्रकार शेरशाह की भाँति उसकी व्यवस्था भी रैयतवाड़ी थी।
⦁    लगान के लिए किसानों को पट्टे दिए जाते थे, जिसमें उनकी भूमि और लगान का विवरण होता था। किसानों से उनकी स्वीकृति (कबूलियत) भी ली जाती थी।
⦁    भूमि सुधार को प्रोत्साहन दिया जाता था और आपत्तिकाल में लगान कम अथवा माफ भी कर दिया जाता था।
⦁    दहसाला प्रबन्ध सम्पूर्ण राज्यों में लागू नहीं किया गया था। वह प्रमुख रूप से बिहार, इलाहाबाद, मालवा, अवध, आगरा, दिल्ली, लाहौर और मुल्तान में लागू था।

अकबर की उपर्युक्त लगान-व्यवस्था की कुछ ब्रिटिश इतिहासकारों ने आलोचना की है। उनके अनुसार लगान कर्मचारी भ्रष्ट थे, जो किसानों पर अत्याचर करते थे और किसानों से अधिक मात्रा में लगान वसूल किया जाता था। परन्तु अधिकांश भारतीय इतिहासकार अकबर की लगान-व्यवस्था को श्रेष्ठ और सफल मानते हैं। इनके अनुसार उपज का 1/3 भाग मध्य युग का न्यूनतम लगान था। लगान के अतिरिक्त अकबर अन्य कोई कर नहीं लेता था। इस प्रकार अकबर की लगान-व्यवस्था के सम्बन्ध में लेनपूल ने लिखा है, “ मध्य युग के इतिहास में आज तक किसी व्यक्ति का नाम इतना ख्यातिपूर्ण नहीं माना गया है, जितना टोडरमल का और इसका कारण यह है कि अकबर के सुधारों में से कोई भी सुधार इतनी अधिक मात्रा में प्रजा के हितों की पूर्ति करने वाला न था, जितनी इस महान् अर्थशास्त्री द्वारा की गई लगान की पुनर्व्यवस्था।”

जहाँगीर के समय में लगान-व्यवस्था का मूल स्वरूप अकबर के समय की भाँति ही रहा परन्तु उसका प्रबन्ध शिथिल हो गया। डॉ० बी०पी० सक्सेना के अनुसार, राज्य की 70% भूमि जागीरदारों को दे दी गई और राज्य का सम्पर्क जागीरदारी भूमि के किसानों से न रहा। शाहजहाँ ने किसानों के कर-भार में वृद्धि कर दी। उसने लगान वसूल करने के लिए भूमि को ठेकेदारों को दिया जाना भी आरम्भ कर दिया। औरंगजेब के समय में राज्य की आर्थिक कठिनाइयों के कारण किसानों पर अधिक दबाव डाला गया। किसानों से लगान वसूल करने के लिए कठोरता भी की गई, जिससे किसानों की स्थिति खराब हो गई। उत्तरकालीन मुगल बादशाहों के समय में तो यह व्यवस्था पूर्णतया समाप्त हो गई और भूमि को ठेकेदारों को देने के अतिरिक्त और कोई कार्य शेष न रहा। इससे किसानों की स्थिति खराब हो गई और राज्य का आर्थिक ढाँचा नष्ट हो गया।



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