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निबन्ध:चलचित्र : लाभ और हानियाँ |
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Answer» प्रस्तावना मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, जो समाज में रह कर ही अपने मनोरंजन के माध्यम हूँढ़ने का यत्न करता है। समय और परिस्थिति के अनुसार उसके मनोरंजन के साधन बदलते रहते हैं। जब तक विज्ञान का पूर्ण विकास नहीं हुआ था, तब तक वह मेले-तमाशे आदि के माध्यम से अपना मनोरंजन करता था, परन्तु वैज्ञानिक विकास के साथ उसने अपनी सुख-सुविधाओं के नवीन साधनों का भी आविष्कार किया है। उसने दृश्य और श्रव्य की सहायता से अनेक आविष्कार किये हैं और इन्हीं के संयोग से चलचित्र का निर्माण किया है। सन् 1929 तक बने चलचित्रों में फोटोग्राफी तो सचल थी पर उनमें ध्वनि की कमी थी। सवाक् चलचित्रों का निर्माण सन् 1930 से आरम्भ हो गया था। पिछले वर्षों में इसने जो भी उन्नति की है, उसी के कारण मानव-मनोरंजन के क्षेत्र में इनको प्रमुख स्थान हो गया है। चलचित्रों की व्यापकता–चलचित्रों ने समाज को अत्यधिक प्रभावित किया है। प्रारम्भ में जनता ने कौतूहल के साथ इस मनोरंजन का आस्वादन किया। धीरे-धीरे उसको इसमें कथा, नाटक, प्रहसन आदि का आनन्द भी मिलने लगा। इससे सिनेमा के दर्शकों की संख्या में वृद्धि होने लगी। जनता के प्रत्येक वर्ग में इसके प्रति मोह बढ़ने लगा। आज भारत में अमेरिका के बाद दूसरे नम्बर पर चलचित्रों का निर्माण होता है। प्रतिवर्ष भारत में बनने वाले चलचित्रों की संख्या लगभग एक हजार है। इनके निर्माण पर अरबों रुपये खर्च होते हैं। यह एक सफल व्यवसाय बन चुका है, जिसमें न जाने कितने लागों को रोजगार के अवसर प्राप्त होते हैं। मनोरंजन का साधन–सिनेमा आज मनोरंजन का प्रमुख, सर्वसुलभ एवं सस्ता माध्यम माना जाता है। दिन भर विभिन्न कार्यों में लगे रहने के कारण लोगों का मन श्रान्त-क्लान्त रहता है। अपनी शारीरिक एवं मानसिक थकान को दूर करने के लिए वे थोड़ी-सी राशि व्यय करके सिनेमा देखते हैं तथा इसे देखते हुए आनन्द की धारा में बहकर अपनी समस्त पीड़ाओं को भूल जाते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें जो मानसिक सन्तुष्टि प्राप्त होती है, उससे वे अपने अगले दिन के कार्यों के लिए उत्साह प्राप्त करते हैं। सिनेमा शिक्षा के प्रचार का साधन भी स्वीकार किया जाता है। इसके द्वारा हमें अनेक प्रकार की शिक्षाएँ प्राप्त होती हैं। जिनके आधार पर दर्शक अपनी बुद्धि का प्रयोग करते हुए अपने जीवन से विभिन्न बुराइयों को दूर कर अपना जीवन ‘आदर्श जीवन’ बना सकते हैं। अनेक समस्याओं के सहज, स्वाभाविक समाधान भी चलचित्रों के माध्यम से सुझाये जा सकते हैं, जो समाज में नवचेतना उत्पन्न कर सकते हैं। वीरों एवं देशभक्तों के चरित्रों पर बनी फिल्में राष्ट्रीय भावना को जाग्रत करती हैं। समाज पर कुप्रभाव-सिनेमा ने आधुनिक समाज को जहाँ अत्यधिक प्रभावित करते हुए उसमें नव-चेतना जाग्रत की है, वहीं उसे पर्याप्त हानि भी पहुँचाई है। धन के लोभी फिल्म-निर्देशकों ने भद्दी-अश्लील और फूहड़ फिल्में बनानी आरम्भ कर दी हैं। इस प्रकार के चलचित्रों से दर्शकों के आचरण पर बुरा प्रभाव पड़ता है। श्रृंगार एवं फैशन के प्रति आकर्षण भी चलचित्रों के प्रभाव से बढ़ रहा है। जिन लोगों को इसका व्यसन लग जाता है, वे अपनी आर्थिक स्थिति की चिन्ता किये बिना अपना सर्वस्व इसी में स्वाहा कर देते हैं। फिल्मों से मानवीय मूल्य नष्ट हो रहे हैं। लोगों को दृष्टिकोण हीन और कामुक होने लगा है तथा जीवन की वास्तविकता के प्रति उनकी आस्था समाप्त होने लगी है। कम आयु के बालक जब चलचित्र में अश्लील, अमानवीय और अतिमानवीय व्यवहार देखते हैं तो वे भविष्य में वैसा ही करने की प्रेरणा लेकर घर आते हैं। आज स्थिति ऐसी हो गयी है कि सिनेमाघर बच्चों के बिगड़ने के अड्डे बन गये हैं। बच्चों के आयु से पहले परिपक्व हो जाने के पीछे भी सिनेमा का प्रमुख हाथ है। फिल्मों ने भारतीय समाज को ‘प्रेम-संस्कृति प्रदान की है जिसमें ‘गर्ल फ्रेण्ड’ और ‘ब्वॉय फ्रेण्ड’ का प्रचलन बढ़ा है, पति-पत्नी में मानसिक प्रतिरोध बढ़ा है तथा सामाजिक और पारिवारिक सम्बन्धों में विकार उत्पन्न हुए हैं। उपसंहार–सिनेमा सैद्धान्तिक रूप से ज्ञानवर्द्धक है। इसका व्यावसायिक रूप अत्यन्त हानिकारक है। आज हमें इस प्रकार के चलचित्रों की आवश्यकता है जो सामाजिक, राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक चेतना जगाने वाली हों। फिल्म निर्माण में संलग्न निर्माता, निर्देशकों, अभिनेताओं आदि को भी अपना उत्तरदायित्व समझते हुए समाज-सुधार एवं राष्ट्र-निर्माण में योगदान देना चाहिए। दर्शकों को सिनेमा मनोरंजन के लिए देखना चाहिए, व्यसन के रूप में नहीं तभी सिनेमा की सार्थकता सिद्ध होगी। |
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