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निबन्ध:ग्राम्य-जीवन

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प्रस्तावना–भारत ग्रामप्रधान देश है। यहाँ की 70% जनसंख्या ग्रामों में निवास करती है। गाँधीजी का कथन था कि, “भारत ग्रामों में बसता है।’ कवीन्द्र रवीन्द्र का कथन है कि ‘‘यदि तुम्हें ईश्वर के दर्शन करने हैं तो वहाँ जाओ, जहाँ किसान जेठ की दुपहरी में हल जोतकर एड़ी-चोटी का पसीना एक करता है। इन कथनों से स्पष्ट होता है कि भारत का सच्चा सौन्दर्य ग्रामों में है। भारत में ग्रामों की संख्या अधिक है। ग्रामों में लोग झोपड़ियों में निवास करते हैं, जबकि नगरों के लोग उच्च अट्टालिकाओं और दिव्य प्रासादों में। फिर भी वास्तविक आनन्द ग्रामों में ही प्राप्त होता है, नगरों में नहीं।

ग्रामीणों का सरल और सात्त्विक जीवन–ग्रामों के लोग बाहर से अधनंगे, अनाकर्षक और अशिक्षित होते हुए भी हृदय से सीधे, सच्चे और पवित्र होते हैं। भारत की सच्ची सभ्यता के दर्शन ग्रामों में ही होते हैं। ग्रामवासी ईमानदार और अतिथि-सत्कार करने वाले होते हैं। ग्रामीणों का जीवन कृत्रिमता, बाह्यआडम्बर, छल, धोखा आदि से दूर रहता है। ‘सादा जीवन और उच्च विचार’ की झलक सरल ग्राम्य-जीवन में ही मिलती है। ग्रामीणों में अधिक व्यय की भावना नहीं होती। वे कृत्रिम साधनों से दूर तथा सिनेमा, नाटक , और नाच-रंग से अछूते रहते हैं।

ग्रामीण लोग रूखा-सूखा, जो कुछ मिल जाता है, खा लेते हैं। मोटा और सस्ता कपड़ा पहनते हैं। अतिथि का दिल खोलकर स्वागत करते हैं। खुली हवा और खुली धूप में प्रकृति के ये नौजवान साधु खेतों में काम करते हैं। प्रात:काल की ऊषा की लालिमा से लेकर  सन्ध्या तक ये खेतों में कठिन परिश्रम करते हैं। सन्ध्या-पूजा से अनभिज्ञ इन लोगों के हृदय में ईश्वर निवास करता है। इनमें परमात्मा के प्रति अटूट विश्वास, मानवता से प्रेम तथा भाईचारा, दया, करुणा, सहयोग आदि की उच्च भावनाएँ पायी जाती हैं। गाय-भैंस के ताजे दूध और मक्खन, अपने खेत में उत्पन्न अन्न और सब्जियों, ग्राम-वधुओं के हाथ से पीसे गये आटे और उनके द्वारा बिलोये गये मट्टे में जो आनन्द और सन्तोष मिलता है, वह नगरों के चटनी, अचार, मुरब्बों और पकवानों में कहाँ ?

ग्राम्य-जीवन का आनन्द–ग्रामवासियों का जीवन सरल, शान्त और आनन्दमय होता है। नगरों की विशाल अट्टालिकाओं, चौड़ी-चिकनी सड़कों, बिजली की चकाचौंध, सिनेमा, नाट्यधरों और अन्य विलासिता की सामग्री में वह आनन्द नहीं, जो शान्त, एकान्त, कोलाहल से दूर प्रकृति की सुरम्य गोद अर्थात् ग्रामों के वातावरण में है। कल-कल नाद करके बहती हुई नदी की धारा, घनी अमराइयों, पुष्पित लताओं, दूर तक फैली हरीतिमा और लहलहाते खेतों से जो मानसिक शान्ति और आत्म-सन्तोष मिलता है, वह धुआँ उगलती चिमनियों, क्लोरीन मिले पानी, सड़कों पर घर-घर्र और पों-पों के कोलाहल, हवा की पहुँच से दूर घने बसे घरों के वातावरण से पूर्ण नगरों में कहाँ ? गाँवों में प्रकृति का शुद्ध रूप देखने को मिलता है।

भारतीय ग्रामों की दुर्दशा-सरलता, सादगी और प्रकृति की सुरम्य गोद अर्थात् भारतीय ग्रामों की एक अपनी करुण कहानी है। शताब्दियों से इन दीन-हीन किसानों का शोषण होता आ रहा है। आज ग्रामों में जो विकट समस्याएँ मुँह बाये खड़ी हुई हैं, वे भारत जैसे देश के लिए कलंक की बात हैं। अधिकांश ग्रामीण अशिक्षा के भयंकर रोग, दरिद्रता के दुर्दान्त दानव एवं अन्धविश्वास के भूत से ग्रसित हैं। भारत की स्वतन्त्रता से पूर्व कृषक का जन्म दरिद्रता और अज्ञान के मध्य होता था, वे अन्धविश्वास और ऋण की गोद में पलते थे, दु:ख और दरिद्रता में बड़े होते थे। भारत की लोकप्रिय सरकार ने ग्रामों की दशा में उल्लेखनीय सुधार किये हैं।

वर्तमान समय में गाँव दुर्गुणों, बुराइयों, रूढ़ियों एवं हानिकारक रीति-रिवाजों के अड्डे बन गये हैं। भोले किसानों को सूदखोर महाजनों एवं मुनाफाखोर व्यापारियों के शोषण का शिकार होना पड़ता है। ग्रामों में स्नेह, स्वावलम्बन, सहयोग, सरलता, पवित्रता आदि गुणों को लोप होता जा  रहा है। बढ़ती हुई बेकारी ने ग्रामीणों के जीवन को कुण्ठित और निराशामय बना दिया है। जातिवाद, लड़ाई-झगड़े एवं मुकदमेबाजी के कारण उनका जीवन नरकतुल्य बन गया है; अतः ग्रामों के देश भारत की सर्वांगीण उन्नति करने के लिए ग्रामों के सुधार की नितान्त आवश्यकता है।

सरकार के सुधार और प्रयत्न-हमारी लोकप्रिय सरकार ग्रामों के सुधार की ओर विशेष ध्यान दे रही है। ग्रामों में रोगों से मुक्ति दिलाने के लिए अस्पताल तथा अशिक्षा को दूर करने के लिए स्कूल खोले जा रहे हैं। ग्रामों के आर्थिक विकास के लिए उन्हें सड़कों और रेलमार्गों से जोड़ा जा रहा है। नलकूपों, बिजली, उत्तम बीज, रासायनिक खाद तथा कृषि-यन्त्रों को सुलभ कराके ग्रामों की दशा सुधारी जा रही है। ग्राम पंचायतों के माध्यम से रेडियो, टेलीविजन आदि के द्वारा मनोरंजन के साधन सुलभ कराये जा रहे हैं।

उपसंहार–स्वतन्त्रता से पूर्व ग्रामों की दशा अत्यन्त शोचनीय थी। सरकार के प्रयत्नों से ग्रामों की दशा में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। ग्राम-सुधार और विकास कार्यक्रमों में तेजी लाने के लिए ग्राम के उत्साही युवकों का सहयोग अपेक्षित है। वह दिन दूर नहीं है, जब भारत के ग्राम पुन: ‘पृथ्वी का स्वर्ग’ कहलाएँगे।



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