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निबंध लेखन :व्यायाम का महत्व

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प्रस्तावना :
महाकवि कालिदास का कथन है – “शरीर माद्य खलु धर्म साधतम्”। इसका अर्थ है – धर्म साधन शरीर के द्वारा ही होता है। मानव अनेक सत्कार्य करता रहता है। अतः धार्मिक कार्यक्रमों के लिए सामाजिक सेवा के लिए तथा आत्मोद्धार के लिए शरीर की आवश्यकता बहुत है। अतः हर एक को स्वस्थ रहने व्यायाम की बडी आवश्यकता है।

उद्देश्य :
शरीर के दृढ और स्वस्थ होने पर ही कोई काम कर सकते हैं। शारीरिक स्वास्थ्य के कारण मानसिक उल्लास के साथ आत्मीय आनंद भी प्राप्त होता है। अतः हर एक को स्वस्थ रहने का प्रयत्न करना चाहिए। इसके लिए व्यायाम की बडी ज़रूरत है। व्यायाम के अनेक भेद हैं। विभिन्न प्रकार के योगासन, बैठक, दौडना, घूमना, प्राणायाम, कुश्ती, तैरना आदि सभी व्यायाम के अंतर्गत ही आते हैं। विद्यार्थी जीवन में ही व्यायाम करना बहुत आवश्यक है।

लाभ :
व्यायाम से शरीर सदा सक्रिय बना रहता है। रक्त संचार खूब होता है। रक्त के मलिन पदार्थ बाहर चले जाते हैं। पाचन शक्ति बढ़ती है। सारे इंद्रिय अपने – अपने काम ठीक करते रहते हैं। व्यायामशील आदमी आत्मविश्वासी और निडर होकर स्वावलंबी होता है।

नष्ट :

व्यायाम तो अनिवार्य रूप से करना है। लेकिन व्यायाम करते समय अपनी आयु का ध्यान रखना चाहिए। व्यक्ति और व्यक्ति में व्यायाम का स्तर बदलता रहता है। इसका ध्यान नहीं है तो लाभ की अपेक्षा नष्ट ही अधिक होगा। उपसंहार : सब लोगों को व्यायाम प्रिय होना चाहिए। व्यायाम से व्यक्ति स्वस्थ बनकर अपना आयु प्रमाण बढा सकता है। अतः व्यायामशील व्यक्ति का जीवन सदा अच्छा और सुखमय होता है।



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