| 1. |
निबन्ध:परिवार नियोजन |
|
Answer» प्रस्तावना–परिवार-नियोजन का तात्पर्य है-परिवार को सीमित रखना, दूसरे शब्दों में कम सन्तान को जन्म देना या जनसंख्या पर रोक लगाना। भारतवर्ष बीसवीं-इक्कीसवीं सदी में जिस सबसे बड़े और • भयानक संकट के दौर से गुजर रहा है, वह है-जनसंख्या-विस्फोट। भारत की स्थिति-भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या के आँकड़े चौंका देने वाले हैं। यहाँ की आबादी एक अरंब बीस करोड़ का आँकड़ा पार कर चुकी है। हर मिनट में कई बच्चे जन्म ले लेते हैं। इस प्रकार प्रतिवर्ष सवा करोड़ की वृद्धि होती चली जाती है। दूसरे शब्दों में, भारत में हर वर्ष एक नया ऑस्ट्रेलिया समा जाता है। जनसंख्या : समस्या क्यों ?–बढ़ती हुई जनसंख्या भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा इसलिए है, क्योंकि भारत के पास बढ़ती हुई आबादी को खिलाने-पिलाने, काम देने और बसाने की सुविधाएँ नहीं हैं। बढ़ती आबादी और साधनों का सन्तुलन बुरी तरह टूट चुका है। भारत की आबादी विश्व की कुल आबादी का लगभग 17% है, जब कि भूमि केवल 2% ही है। इस भूमि को बढ़ाने का कोई तरीका हमारे पास नहीं है। दूसरी समस्या यह है कि देश में खाद्यान्न 4 +4 = 8 की दर से बढ़ते हैं तो जनसंख्या 4 x 4 = 16 की दर से। इस भाँति भूमि पर नित्य अभाव, गरीबी और भूख का दबाव बढ़ता चला जाता है। आजीविका के साधनों का भी यही हाल है। आजादी के बाद देश में कुछ लाख ही बेरोजगार थे, जिनकी संख्या बढ़कर आज कई करोड़ तक पहुँच चुकी है। जनसंख्या-विस्फोट से सारा देश भयाक्रान्त है। जहाँ भी जाइए लोगों की अनन्त भीड़ दिखायी देती है। महानगरों में तो लोग मधुमक्खी के छत्तों की भाँति मँडराते नजर आते हैं। इससे प्रत्येक प्राणी पर मानसिक तनाव बढ़ता है। लोगों के लिए पैदल चलना तक कठिन हो गया है। इसके अतिरिक्त बेकार लोगों की भीड़ चोरी, उपद्रव, अपराध आदि में रुचि लेती है। अधिक जनसंख्या से देश का जीवन-स्तर कदापि नहीं उठ सकता; क्योंकि जीवन-स्तर का सीधा सम्बन्ध समृद्धि से है। जनसंख्या-वृद्धि से परिवार की सम्पन्नता में वृद्धि की जगह बिखराव आता है। इसलिए खाते-पीते परिवार भी गरीब होते चले जाते हैं। भारत में जनसंख्या वृद्धि के कारण स्वास्थ्य, शिक्षा और आवास की समस्या दिनोंदिन बढ़ती चली जा रही है जिससे देश का आर्थिक ढाँचा बुरी तरह चरमरा रहा है। जनसंख्या-वृद्धि के कारण-जनसंख्या-विस्फोट का सबसे बड़ा कारण है जन्म-दर और मृत्यु-दर का सन्तुलन बिगड़ना। भारत की मृत्यु-दर निरन्तर कम होती जा रही है, जब कि जन्म-दर वहीं-की–वहीं है। मृत्यु-दर इसलिए कम हुई है, क्योंकि स्वास्थ्य-सेवाओं में पर्याप्त सुधार हुआ है। हैजा, टी० बी०, मलेरिया, चेचक आदि जानलेवा बीमारियों का शत-प्रतिशत उपचार हुँढ़ लिया गया है। वैज्ञानिक उन्नति के कारण बाढ़, सूखा, अकाल, प्राकृतिक प्रकोपों पर भी पर्याप्त नियन्त्रण कर लिया गया है, परन्तु । जन्म-दर को रोकने में उतनी अधिक सफलता नहीं मिली है। जनसंख्या-वृद्धि रोकने के उपाय-जनसंख्या-वृद्धि को रोकने का सबसे कारगर उपाय यह है कि नर-नारी को सीमित परिवार की शिक्षा दी जाए। शहरों में यह कार्य लगभग पूरा हो चुका है। शहरी आबादी सीमित परिवार के प्रति सचेत है, परन्तु ग्रामीण आबादी अभी भी इस विषय में लापरवाह है। जब तक सामाजिक संस्थाएँ सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर सीमित परिवार की चेतना नहीं जगाएँगी, तब तक जनसंख्या की बाढ़ आती रहेगी। शहरों में भी अभी लोग पुत्र-मोह के कारण दो लड़कियों के पश्चात् तीसरी-चौथी सन्तान पैदा कर देते हैं। अभी कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो अन्धविश्वास के कारण सन्तान को रोकने में बुराई मानते हैं। इसका उपचार लगातार शिक्षा देने से ही हो सकता है। उपसंहार : शिक्षा तथा प्रोत्साहन-जनसंख्या को सीमित करने के लिए औपचारिक शिक्षा के साथ-साथ परिवार-नियोजन की शिक्षा भी दी जानी चाहिए। उन माता-पिताओं को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जिन्होंने परिवार को सीमित किया है। सरकार ने अपनी ओर से ऐसे अनेक उपाय किये हैं, परन्तु आवश्यकता इस बात की है कि परिवार को सीमित बनाने सम्बन्धी कठोर कानून बनाये जाएँ तभी हर मिनट बढ़ता हुआ खतरा रुक सकता है। इस विषय में यदि कोई जाति, धर्म या सम्प्रदाय आड़े भी आता है तो उसकी परवाह नहीं करनी चाहिए। अब तो जनसंख्या-वृद्धि जीवन और मरण का प्रश्न बन चुका है। डॉ० चन्द्रशेखर ने सच ही कहा है-“हम एक रात की भी प्रतीक्षा नहीं कर सकते। परिवार-नियोजन के बिना हर रात एक भयावह स्वप्ने की तरह है।’ |
|