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निबन्ध:तुलसीदास |
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Answer» प्रस्तावना–संसार में अनेक प्रसिद्ध साहित्यकार हुए हैं, जिनकी अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं। यदि मुझसे पूछा जाए कि मेरा प्रिय साहित्यकार कौन है? तो मेरा उत्तर होगा-महाकवि तुलसीदास। यद्यपि तुलसी के काव्य में भक्ति-भावना प्रधान है, परन्तु उनका काव्य कई सौ वर्षों के बाद भी भारतीय जनमानस में रचा-बसा हुआ है और उनका मार्ग-दर्शन कर रही है, इसलिए तुलसीदास मेरे प्रिय साहित्यकार हैं। उनकी भक्ति-भावना, समन्वयात्मक दृष्टिकोण तथा काव्य सौष्ठव ने मुझे अनायास अपनी ओर आकृष्ट किया है। जन्म की परिस्थितियाँ—तुलसीदास जी का जन्म अत्यन्त विषम परिस्थितियों में हुआ था। हिन्दू समाज अशक्त होकर मुगलों के चंगुल में फंसा हुआ था। हिन्दू-समाज की संस्कृति और सभ्यता पर निरन्तर आघात हो रहे थे। कहीं पर कोई भी उचित आदर्श नहीं था। इस युग में मन्दिरों का विध्वंस और ग्रामों व नगरों का नाश दे रहा था। अच्छे संस्कार समाप्त हो रहे थे। तलवार के बल पर हिन्दुओं को मुसलमान बनाया जा रहा था। सर्वत्र धार्मिक विषमता व्याप्त थी। विभिन्न सम्प्रदायों ने अपनी इफली, अपना राग अलापना आरम्भ कर दिया था। ऐसी स्थिति में भोली-भाली जनता यह समझने में असमर्थ थी कि वह किस सम्प्रदाय का आश्रय ले। दिग्भ्रमित जनता को ऐसे नाविक की आवश्यकता थी, जो उनकी जीवन-नौका को सँभाल सके। गोस्वामी तुलसीदास ने निराशा के अन्धकार में डूबी हुई जनता के समक्ष भगवान् राम का लोकमंगलकारी रूप प्रस्तुत किया। इस प्रकार उन्होंने जनता में अपूर्व आशा एवं शक्ति का संचार किया। युगद्रष्टा तुलसी ने अपनी रचना ‘श्रीरामचरितमानस’ के द्वारा विभिन्न मतों, सम्प्रदायों एवं धाराओं का समन्वय किया। उन्होंने अपने युग को नवीन दिशा, नई गति एवं नवीन प्रेरणा दी। सच्चे लोकनायक के समान उन्होंने लोगों को मानवता के सूत्र में बाँधने का सफल प्रयास किया। लोकनायक तुलसीदास-आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का कथन है-“लोकनायक वही हो सकता है, जो समन्वय कर सके। भारतीय समाज में विभिन्न प्रकार की परस्पर विरोधी संस्कृतियाँ, जातियाँ, आचार, निष्ठा और विचार-पद्धतियाँ प्रचलित हैं। बुद्धदेव समन्वयकारी थे, ‘गीता’ ने समन्वय की चेष्टा की और तुसलीदास भी समन्वयकारी थे।” तुलसी के राम-तुलसीदास उन राम के उपासक थे, जो सच्चिदानन्द परब्रह्म हैं तथा जिनका भूमि पर पापरूपी हरण करने के लिए अवतार होता है। जब-जब होइ धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी ॥ तुलसीदास जी ने अपने काव्य में सभी देवी-देवताओं की स्तुति की है, लेकिन अन्त में वे यही कहते तुलसीद हैं। माँगत तुलसीदास कर जोरे। बसहिं रामसिय मानस मोरे॥ निम्नलिखित पंक्तियों में भगवान राम के प्रति उनकी अनन्यता और भी अधिक पुष्ट हुई है– एक भरोसो एक बल, एक आस बिस्वास । तुलसीदास के समक्ष ऐसे राम का जीवन था, जो मर्यादाशील थे तथा शक्ति एवं सौन्दर्य के अवतार थे। मो सम दीन ने दीन हित, तुम्ह समान रघुबीर।। धर्म-समन्वय की भावना-तुलसीदासजी के काव्य की सबसे बड़ी विशेषता धर्म-समन्वय है। इसे प्रवृत्ति के कारण वे वास्तविक अर्थों में लोकनायक कहलाए। उनके काव्य में धर्म-समन्वय के अग्रलिखित रूप दृष्टिगोचर होते हैं (i) सगुण-निर्गुण का समन्वय ईश्वर के सगुण और निर्गुण दोनों रूपों का विवाह दर्शन एवं भक्ति दोनों ही क्षेत्रों में प्रचलित था। तुलसीदास ने कहा है सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा॥ (ii) कर्म, ज्ञान एवं भक्ति का समन्वय-तुलसीदास जी की भक्ति मनुष्य को संसार से विमुख करके अकर्मण्य बनाने वाली नहीं है, अपितु सत्कर्म की प्रबल प्रेरणा देने वाली है। उनका सिद्धान्त है कि राम के समान आचरण करो, रावण सदृश नहीं— भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा। उभय हरहिं भव सम्भव खेदा॥ तुलसी ने ज्ञान और भक्ति के धागे में राम के नाम का मोती पिरो दिया है, जो सबके लिए मान्य है– हिय निर्गुन नयनन्हे सगुन, रसना राम सुनाम। (iii) युगधर्म समन्वय-भगवान को प्राप्त करने के लिए अनेक प्रकार के बाह्य तथा आन्तरिक साधनों की आवश्यकता होती है। ये साधन प्रत्येक युग के अनुसार बदलते रहते हैं और इन्हीं को युगधर्म की संज्ञा दी जाती है। तुलसीदास जी ने इनका भी समन्वय प्रस्तुत किया है कृतयुग त्रेता द्वापर, पूजा मख अरु जोग। (iv) सामाजिक समन्वय-तुलसीदास जी के समय में भारतीय समाज अनेक प्रकार की विषमताओं तथा कुरीतियों से ग्रस्त था। आपस में भेदभाव की खाई चौड़ी होती जा रही थी। ऊँच-नीच, धनी-निर्धन, स्त्री-पुरुष तथा गृहस्थ व संयासो का अन्तर बढ़ता जा रहा था। रामकथा की चित्रात्मकता एवं विषय-सम्बन्धी अभिव्यक्ति इतनी व्यापक और सक्षम थी कि उससे तुलसीदास जी के दोनों उद्देश्य सिद्ध हो जाते थे। सन्त-असन्त का समन्वय, व्यक्ति और समाज का समन्वय तथा व्यक्ति और परिवार का समन्वय आदि तुलसीदास के काव्य में सर्वत्र दृष्टिगोचर हुआ है। (v) साहित्यिक समन्वय-साहित्य की दृष्टि से भी तुलसी का काव्य अद्वितीय है। इनके काव्य में सभी रसों को स्थान मिला है जिनका प्रभाव इनके काव्य में देखने को मिलता है। साहित्यिक क्षेत्र में भाषा, छन्द, सामग्री, रस, अलंकार आदि की दृष्टि से भी तुलसी ने अनुपम समन्वय स्थापित किया। उस समय साहित्यिक क्षेत्र में विभिन्न भाषाएँ विद्यमान थीं तथा विभिन्न छन्दों में रचनाएँ की जाती थीं। तुलसी ने अपने काव्य में संस्कृत, अवधी तथा ब्रजभाषा का अद्भुत समन्वय किया। उपसंहार—तुलसी ने अपने युग और भविष्य, स्वदेश और विश्व, व्यष्टि सभी के सन्दर्भ में महत्त्वपूर्ण सामग्री दी है। तुलसीदास जी को ‘आधुनिक दृष्टि ही नहीं, हर युग की दृष्टि मूल्यवान् मानेगी; क्योंकि मणि की चमक अन्दर से आती है बाहर से नहीं।। कवि तुलसीदास जी की भाषा अत्यन्त सरल और सरस है। उन्होंने श्रीरामचरितमानस का जितना सरल गेयरूप में वर्णन किया है वह अतुलनीय है। यद्यपि मैंने जितने भी साहित्यों का अध्ययन किया है मानस जैसा सरलीकरण और शब्दों की अभिव्यक्ति किसी में नहीं पायी। अतैव इनकी अतुलनीय साहित्यिक विशेषताओं के कारण इनके बारे में यही कहा जा सकता है- “कविता करके तुलसी न लसे, कविता लसी पा तुलसी की कला।” |
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