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निबन्ध:यदि मैं अपने विद्यालय का प्रधानाचार्य होता |
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Answer» प्रस्तावना-कल्पना भी क्या चीज होती है। कल्पना के घोड़े पर सवार होकर मनुष्य न जाने कहाँ-कहाँ की सैर कर आता है। यद्यपि कल्पना की कथाओं में वास्तविकता नहीं होती तथपि कल्पना में जहाँ मनुष्य क्षण भर के लिए आनन्दित होता है, वहीं वह अपने लिए कतिपय आदर्श भी निर्धारित कर लेता है। इसी कल्पना से लोगों ने नये कीर्तिमान भी स्थापित किये हैं। एडीसन, न्यूटन, राइट बंधु आदि सभी वैज्ञानिकों ने कल्पना का सहारा लेकर ही ये नये आविष्कार किये। कल्पना में मनुष्य स्वयं को सर्वगुणसम्पन्न भी समझने लगता है। मेरी कल्पना प्रधानाचार्य बनना-मेरी कल्पना अपने आप में अत्यन्त सुखद है कि काश मैं अपने विद्यालय का प्रधानाचार्य होता। प्रधानाचार्य का पद गौरव एवं उत्तरदायित्वपूर्ण होता है। मैं प्रधानाचार्य होने पर अपने सभी कर्तव्यों का भली-भाँति पालन करता। हमारे विद्यालय में तो प्रधानाचार्य यदा-कदा ही दर्शन देते हैं जिससे विद्यार्थी और अध्यापकगण कृतार्थ हो जाते हैं। मैं नित्य-प्रति विद्यालय आता। अपने विद्यार्थियों व अध्यापकगणों की समस्याएँ सुनता और तदनुरूप उनका समाधान करता। अध्यापकों पर ध्यान देना-सामान्यत: विद्यालयों में कुछ अध्यापक अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने ही आते हैं। वे स्वतन्त्र व्यवसाय करते हैं तथा विद्यार्थियों को पढ़ाना अपना कर्तव्य नहीं समझते। हमारे गणित के अध्यापक शेयरों का धन्धा करते हैं। मन्दी आने पर वे सारा क्रोध विद्यार्थियों पर निकालते हैं। यदि कोई विद्यार्थी उनसे प्रश्न हल करवाने चला जाता है तो वे उसकी पिटाई कर देते हैं। अंग्रेजी के अध्यापक बीमा कम्पनी के एजेन्ट हैं। वे अभिभावकों को बीमा करवाने की नि:शुल्क सलाह देते रहते हैं। अधिकांश अध्यापक ट्यूशन पढ़ाने के शौकीन हैं। वे कक्षा में बिल्कुल नहीं पढ़ाते। जो छात्र उनसे ट्यूशन नहीं पढ़ते, उन्हें वे अनावश्यक रूप से परेशान करते हैं। यहाँ तक कि उनको परीक्षाओं में भी असफल कर देते हैं। यदि मैं अपने विद्यालय का प्रधानाचार्य होता तो सर्वप्रथम अध्यापकों की बुद्धि की इस मलिनता को दूर करता। ट्यूशन पढ़ाने को निषेध घोषित करता तथा ट्यूशन पढ़ाने वालों को दण्डित करता। जो अध्यापक अपने कर्तव्यों को पूरा नहीं करते उनको विद्यालय से निकालने अथवा उनके स्थानान्तरण की संस्तुति कर देता। सभी अध्यापकों को आदर्श अध्यापक बनने के लिए येन-केन प्रकारेण विवश कर देता। पुस्तकालय, खेल आदि का स्तर सुधारने पर बल-हमारे विद्यालय के पुस्तकालय की दशा अत्यन्त शोचनीय हैं। छात्रों को पुस्तकालय से अपनी रुचि एवं आवश्यकता की पुस्तकें नहीं मिलती। मैं विद्यालय के पुस्तकालय की दशा सुधारता। शिक्षाप्रद पुस्तकों तथा महान साहित्यकारों की पुस्तकों की पर्याप्त मात्रा में प्रतियाँ खरीदवाता। किसी भी विषय की पुस्तकों का पुस्तकालय में अभाव नहीं रहने देता और निर्धन विद्यार्थियों को नि:शुल्क पुस्तकें भी उपलब्ध कराता।। हमारे विद्यालय में खेलों का आवश्यक सामान नहीं है। प्रधानाचार्य होने पर मैं विद्यार्थियों की आवश्यकतानुसार खेल का सामान उपलब्ध करवाता। विद्यालय की टीम के जीतने पर खिलाड़ियों को पुरस्कृत कर उनका मनोबल बढ़ाता। अपने विद्यालय की टीमों को खेलने के लिए बाहर भेजता, साथ ही अपने विद्यालय में भी नये-नये खेलों का आयोजन करता राज्यीय और अन्तर्राज्यीय प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करता। विद्यालय की दशा सुधारना-मैं विद्यार्थियों से श्रमदान करवाता। श्रमदान के द्वारा विद्यालय के बगीचे में नाना-प्रकार के पेड़-पौधे लगवाता। विद्यार्थियों को पर्यावरण के विषय में सचेत करती। विद्यालय के चारों ओर खुशबूदार फूलों के पौधे लगवाता, जिससे विद्यालय का वातावरण फूलों की सुगन्ध से खुशनुमा हो जाता। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के विषय में मेरा विद्यालय अपने क्षेत्र का सर्वोत्तम विद्यालय होता। संगीत, कला, आदि की शिक्षा की विद्यालय में समुचित व्यवस्था करवाता। प्रत्येक महीने चित्रकला व वाद-विवाद प्रतियोगिता करवाता। विद्यार्थियों के मस्तिष्क में कला के प्रति आकर्षण पैदा करता। इस प्रकार मैं अपने विद्यालय को नवीन रूप प्रदान करता।। शिक्षा-परीक्षा पद्धति में परिवर्तन-इतना करने के उपरान्त मैं सर्वप्रथम शिक्षा पद्धति में परिवर्तन लाने पर ध्यान केन्द्रित करता। शिक्षा विद्यार्थियों के लिए सामाजिक, नैतिक, बौद्धिक विकास में सहायक होती है। मैं विद्यालय में प्राथमिक शिक्षा पर तो ध्यान देता ही साथ ही व्यावसायिक प्रशिक्षण की भी सुविधा प्रदान करवाता। इस प्रकार विद्यार्थियों को शिक्षा-प्राप्ति के बाद पराश्रित नहीं रहना पड़ता। मैं अपने विद्यालय में हिन्दी को अनिवार्य विषय घोषित करता। इसमें विद्यार्थियों में राष्ट्रभाषा के प्रति सम्मान की भावना जाग्रत होती, साथ ही उनमें देश-प्रेम की भावना भी आती। हमारे विद्यालय की परीक्षा-प्रणाली बहुत दोषपूर्ण है। परीक्षा से पहले ही विद्यार्थी अत्यधिक तनावग्रस्त हो जाते हैं। मेरे प्रधानाचार्य बनने पर विद्यार्थियों को परीक्षाओं को भूत इस तरह नहीं सताता कि उन्हें अनैतिक विधियाँ अपनाकर परीक्षा उत्तीर्ण करनी पड़े। वार्षिक परीक्षा के साथ-साथ आन्तरिक मूल्यांकन भी उनकी योग्यता का मापदण्ड होता। लिखित और मौखिक दोनों रूप में परीक्षा होती। शारीरिक स्वास्थ्य भी परीक्षा का एक भाग होता तथा परीक्षा छात्रों के चहुंमुखी विकास का मूल्यांकन करती। उपसंहार–यदि मैं प्रधानाचार्य होता तो विद्यालय का रूप ही दूसरा होता। यह सब मेरी कल्पना में रचा-बसा है। यदि मैं प्रधानाचार्य बनूंगा तो अपनी सभी कल्पनाओं को साकार करूंगा, यह मेरा दृढ़ संकल्प है। मैं ऐसी सूझबूझ से विद्यालय का संचालन करूंगा कि राज्य में ही नहीं पूरे देश में मेरे विद्यालय का नाम रोशन हो जायेगा। मुझे आशा है कि भगवान मेरी इसे कल्पना को अवश्य पूरा करेगा। |
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