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निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या करेंएक दिन फूलों ने भी कहा था, पत्तियाँ?पत्तियों ने क्या किया?संख्या के बल पर बस डालों को छाप लिया,डालों के बल पर ही चल-चपल रही हैं,हवाओं के बल पर ही मचल रही हैंलेकिन हम अपने से खुले, खिले फूले हैंरंग लिए, रस लिए, पराग लिएहमारी यश-गंध दूर-दूर-दूर फैली है,भ्रमरों ने आकर हमारे गुन गाए हैं,हम पर बौराए हैं।

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डालियों की बातें सुन कर एक दिन पत्तियों ने भी कहा कि डाल में भी भला कोई विशेषता है ? हम मानती हैं कि वे झूमती हैं, झुकती हैं, हिलती हैं परंतु इस आवाज़ वाली दुनिया में क्या कभी उन्होंने एक शब्द भी बोला है ? अर्थात् वे बिलकुल नहीं बोलती हैं। इसके विपरीत पत्तियाँ कहती हैं कि वे सदा हर-हर का शब्द बोलती रहती हैं। उनके आपस में टकराने से वातावरण उनकी खड़खड़ाहट की आवाज़ से भर जाता है। हर वर्ष वे नया स्वरूप प्राप्त कर लेती हैं और पतझड़ में झड़ जाती हैं। वसंत के आने पर वे फिर निकल आती हैं और डालियों पर छा जाती हैं। वे थके हुए मन वाले पथिकों की परेशानियों तथा गर्मी को दूर कर उन्हें शांति प्रदान करती हैं।



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