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निम्नलिखित पर टिप्पणी कीजिए(क) असहयोग आन्दोलन(ख) सविनय अवज्ञा आन्दोलन(ग) साइमन कमीशन(घ) भारत छोड़ो आन्दोलन |
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Answer» (क) असहयोग आन्दोलन- रॉलेट ऐक्ट, जलियाँवाला बाग काण्ड और खिलाफत आन्दोलन के उत्तर में गाँधी जी ने 1 अगस्त, 1920 ई० को असहयोग आन्दोलन प्रारम्भ करने की घोषणा कर दी। सितम्बर, 1920 ई० में कलकत्ता (कोलकाता) के विशेष अधिवेशन में और पुनः दिसम्बर, 1920 ई० में नागपुर के कांग्रेस अधिवेशन में इसका समर्थन किया गया। कांग्रेस का लक्ष्य ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत स्वशासन की बजाय स्वराज्य घोषित करना था। मोहम्मद अली जिन्ना, एनी बेसेण्ट और विपिन चन्द्र कांग्रेस के इस असहयोग से सहमत न थे, अत: उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी। असहयोग आन्दोलन कार्यक्रम के दो मुख्य पक्ष थे- ध्वंसात्मक और रचनात्मक।। (i) ध्वंसात्मक कार्यक्रम- इसमें उपाधियों और अवैतनिक पदों का परित्याग, सरकारी और गैर सरकारी समारोहों का बहिष्कार, सरकारी नियन्त्रण वाले विद्यार्थियों तथा कॉलेजों का त्याग, वकीलों तथा मुवक्किलों द्वारा ब्रिटिश न्यायालयों का बहिष्कार, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार आदि शामिल थे। (ii) रचनात्मक कार्यक्रम- इसमें राष्ट्रीय न्यायालयों और विद्यालयों की स्थापना, स्वदेशी को बढ़ावा देना, चरखा और खादी को लोकप्रिय बनाना, स्वयं सेवक दल का गठन तथा तिलक स्मारक के लिए स्वराज कोष के रूप में एक करोड़ रुपए एकत्र करना मुख्य कार्य थे। आन्दोलन का प्रारम्भ महात्मा गाँधी ने अपनी उपाधियाँ त्यागकर किया। देश के अन्य नेताओं और प्रभावशाली व्यक्तियों ने भी अपनी उपाधियाँ और पदवियाँ छोड़ दीं। विद्यार्थियों ने स्कूल और कॉलेज छोड़े। इस दौरान काशी विद्यापीठ, बिहार विद्यापीठ, जामिया मिलिया इस्लामिया, गुजरात विद्यापीठ जैसे राष्ट्रीय विद्यालयों की स्थापना हुई। देश के सभी बड़े नेताओं ने अपनी वकालत छोड़ दी। विधानमण्डलों का बहिष्कार किया गया। कोई भी कांग्रेसी विधानमण्डल के चुनाव में खड़ा नहीं हुआ। नवम्बर, 1921 में प्रिंस ऑफ वेल्स का बहिष्कार किया गया। सरकार ने कांग्रेस और खिलाफत कमेटियों को गैर-कानूनी घोषित कर दिया। स्थान-स्थान पर विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई और स्वदेशी का प्रचार किया गया। गाँधी जी ने लोगों को ‘तिलक स्वराज्य फंड’ दान देने का आग्रह किया परिणामस्वरूप एक करोड़ रुपए से भी अधिक धनराशि इकट्ठी हो गई। (ख) सविनय अवज्ञा आन्दोलन- सविनय अवज्ञा का अर्थ अंग्रेजी शासन के कानून की शान्तिपूर्ण ढंग से अवहेलना करना था। महात्मा गाँधी को सविनय अवज्ञा आन्दोलन के कार्यक्रमों की घोषणा करने का अधिकार 1 फरवरी, 1930 ई० की कांग्रेस कार्यकारिणी से मिल चुका था, फिर भी गाँधी जी इस प्रयास में रहे कि संघर्ष का रास्ता टल जाए। इसके लिए गाँधी जी ने न्यूनतम कार्यक्रम के अनुसार 11 सूत्री माँग-पत्र लॉर्ड डरविन के सम्मुख रखा और कहा कि अगर सरकार उनकी माँगों पर ध्यान नहीं देती है, तो वह नमक कानून भंग कर सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ कर देंगे। सरकारी प्रतिक्रिया अनुकूल नहीं थी। परिणामस्वरूप गाँधी जी ने यह कहते हुए प्रतिक्रिया व्यक्त की कि ब्रिटिश सरकार की संगठित हिंसा को रोकने का एकमात्र रास्ता संगठित अहिंसा ही हो सकती है।” गाँधी जी ने नमक कानून तोड़कर इस आन्दोलन को शुरू करने का विचार किया। ⦁ गाँव-गाँव में गैर-कानूनी नमक बनाया जाए। शीघ्र ही यह आन्दोलन तेजी से फैला। छात्रों, मजदूरों, किसानों और महिलाओं ने इसमें बढ़-चढ़कर भाग लिया। महिलाओं ने परम्परागत पर्दे को छोड़कर शराब की दुकानों पर धरने दिए। किसानों ने लगान देना बन्द कर दिया। विद्यार्थियों ने स्कूल और कॉलेज छोड़े। विदेशी कपड़ों के बहिष्कार से कई अंग्रेजी मिलें बन्द हो गईं। यह एक ऐसा युग परिवर्तनकारी कदम था जो लीक से हटकर था। सरकार ने दमन की नीति अपनायी जिससे असन्तोष की आग भड़क उठी। गाँधी जी के साथ हजारों लोग गिरफ्तार हुए तथा कांग्रेस को अवैध घोषित कर दिया। (ग) साइमन कमीशन- 1919 ई० के सुधार अधिनियम के अनुसार 10 वर्ष के बाद शासन सुधारों की समीक्षा के लिए कमीशन नियुक्त करने की व्यवस्था थी। अतः यह आयोग 1929 ई० में बैठना था, किन्तु इंग्लैण्ड की बदलती हुई परिस्थितियों के कारण वहाँ की अनुदार पार्टी ने यह कमीशन 1927 ई० में ही नियुक्त कर दिया। इसके अध्यक्ष सर जॉन साइमन के कारण यह ‘साइमन कमीशन’ के नाम से जाना जाता है। इसमें कुल सात सदस्य थे जिनमें कोई भी भारतीय न था। अतः इसे ‘वाटर मैन कमीशन’ भी कहते हैं। कमीशन के आगमन से पूर्व ही इनका विरोध प्रारम्भ हो गया था। कांग्रेस, हिन्दू महासभा, मुस्लिम लीग सभी ने इसका विरोध करने का निर्णय लिया। जब यह कमीशन 3 फरवरी, 1928 ई० को बम्बई (मुम्बई) पहुँचा तो इसे जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा। देश के सभी प्रमुख नगरों में नवयुवकों ने हड़ताल करके काली झण्डियाँ दिखाकर और ‘साइमन कमीशन वापस जाओ’ के नारों से इसका स्वागत किया। लाहौर में विद्यार्थियों ने लाला लाजपतराय के नेतृत्व में एक विशाल जुलूस निकाला। पुलिस अधिकारी साण्डर्स ने लाजपतराय पर लाठी से प्रहार किया। उनको सख्त चोटें आईं और एक महीने के बाद उनका देहान्त हो गया। मृत्यु से पूर्व उन्होंने भाषण देते हुए कहा, “मेरे शरीर पर लगी एक-एक चोट ब्रिटिश राज्य के कफन की कील सिद्ध होगी।” लाजपतराय की मृत्यु से युवा क्रान्तिकारी क्रोधित हो गए और साण्डर्स की हत्या कर दी। लखनऊ में भी पं० जवाहरलाल नेहरू और गोविन्द वल्लभपन्त के नेतृत्व में प्रदर्शन हुआ। कमीशन का विरोध प्रायः सभी दलों व वर्गों के बावजूद भी साइमन कमीशन ने दो बार भारत का दौरा किया। साइमन कमीशन की रिपोर्ट मई, 1930 ई० में प्रकाशित हुई, जिसमें निम्नलिखित बातें कही गईं ⦁ प्रान्तों में दोहरा शासन समाप्त करके उत्तरदायी शासन स्थापित किया जाए। भारतीयों ने इस रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया क्योंकि इसमें आकाँक्षाओं के अनुरूप कहीं भी औपनिवेशिक स्वराज्य स्थापना की बात नहीं कही गई। साइमन कमीशन का आगमन और बहिष्कार सम्पूर्ण देश की बिखरी हुई राजनीतिक भावना को जोड़ने में सहायक सिद्ध हुआ। लाला लाजपत राय की मृत्यु ने देश के नवयुवकों को उत्साहित किया। सर शिवस्वामी अय्यर ने इसे रद्दी की टोकरी में फेंकने लायक बताया, किन्तु फिर भी इस कमीशन की अनेक बातों को 1935 ई० के अधिनियम में अपना लिया गया। (घ) भारत छोड़ो आन्दोलन- ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ गाँधी जी द्वारा आयोजित अन्तिम आन्दोलन था। इस आन्दोलन की विशेषता थी कि यह एक अहिंसात्मक आन्दोलन नहीं था, बल्कि भारतीय जनता के ब्रिटिश शासन के विरुद्ध चरम आक्रोश का प्रतीक था। अन्ततोगत्वा यही आन्दोलन भारत में ब्रिटिश राज्य के सूर्यास्त का कारण बना था। वर्धा प्रस्ताव ( जुलाई 1942 ई०)- अप्रैल 1942 ई० में इलाहाबाद में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में यह निश्चित किया गया कि कांग्रेस किसी ऐसी स्थिति को किसी भी दशा में स्वीकार नहीं कर सकती, जिसमें भारतीयों को ब्रिटिश सरकार के दास के रूप में कार्य करना पड़े। जुलाई 1942 ई० में कांग्रेस कार्य-समिति की वर्धा में सम्पन्न बैठक में गाँधी जी के इन विचारों का समथर्न किया गया कि भारत समस्या का समाधान अंग्रेजों के भारत छोड़ देने में ही है। भारत छोड़ो प्रस्ताव- वर्धा प्रस्ताव के निश्चय के अनुसार 7 अगस्त, 1942 ई० को बम्बई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का अधिवेशन प्रारम्भ हुआ। न केवल भारत वरन् सम्पूर्ण विश्व की निगाहें इस अधिवेशन पर लगी हुई थीं। भविष्य के इतिहास तथा घटनाओं ने इस अधिवेशन को ऐतिहासिक अधिवेशन की संज्ञा प्रदान की। इस समिति ने पर्याप्त विचारविमर्श के उपरान्त भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया, जिसमें कहा गया था, “यह समिति कांग्रेस कार्यकारिणी समिति के 14 जुलाई, 1942 ई० के प्रस्ताव का समर्थन करती है तथा उसका यह विश्वास है कि बाद की घटनाओं ने इसे और अधिक औचित्य प्रदान किया है और इस बात को स्पष्ट कर दिखाया है कि भारत में ब्रिटिश शासन का तत्काल ही अन्त भारत के लिए और मित्र-राष्ट्रों के आदर्शों की पूर्ति के लिए अति आवश्यक है। इसी पर युद्ध का भविष्य और स्वतन्त्रता तथा प्रजातन्त्र की सफलता निर्भर है।” (i) क्रिप्स मिशन की असफलता- भारत के संवैधानिक गतिरोध को दूर करने के लिए तथा स्वतन्त्रता प्राप्ति के मार्ग की समस्याओं को सुलझाने के लिए मार्च 1942 ई० में सर स्टेफर्ड क्रिप्स की अध्यक्षता में क्रिप्स मिशन भारत आया। इस मिशन के प्रस्ताव व सुझाव दोषपूर्ण तथा अपर्याप्त थे। (ii) युद्ध की भयंकरता व शरणार्थियों के प्रति कठोर व्यवहार- इधर भारत पर जापान के आक्रमण का भय लगातार बढ़ रहा था। अंग्रेजों द्वारा ऐसी स्थिति में भारतीयों को दिए जाने वाले प्रलोभन को महात्मा गाँधी ने ‘विफल हो रहे बैंक का उत्तर दिनांकित चेक’ कहा और प्रलोभन में न आने के लिए भारतीयों को आगाह किया। बर्मा से जो भारतीय शरणार्थी भारत आ रहे थे, वे दु:खभरी कहानियाँ सुनाते थे। बर्मा में रह रहे अंग्रेजों को बचाने का भरपूर प्रयास किया गया, लेकिन भारतीय मूल के लोगों का अपमान किया गया। (iii) बंगाल में आतंक का राज्य- पूर्वी बंगाल में भय और आतंक का साम्राज्य था। वस्तुओं के मूल्य बढ़ते जा रहे थे, मुद्रा पर से विश्वास हटता जा रहा था। गाँधी जी को भी यह विश्वास हो गया था कि अंग्रेज भारत की सुरक्षा करने में असमर्थ है। इसलिए गाँधी जी ने अंग्रेजों को भारत से चले जाने को कहा। (iv) दयनीय आर्थिक स्थिति- यूरोप युद्ध के कारण आर्थिक स्थिति बहुत खराब होती जा रही थी, वस्तुओं के मूल्य बढ़ते जा रहे थे और जनता को अत्यधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। मध्यम वर्ग की स्थिति विशेष रूप से सोचनीय थी। (v) जापानी आक्रमण का भय तथा असन्तोषजनक ब्रिटिश रक्षा-व्यवस्था- भारतीयों को यह विश्वास हो गया था कि ब्रिटेनवासी भारत की सुरक्षा करने में असमर्थ हैं। जापान ने सिंगापुर, मलाया तथा बर्मा पर विजय प्राप्त कर ली थी और भारत पर उसके आक्रमण का भय लगातार बढ़ता जा रहा था क्योंकि अंग्रेजों के गृह राज्य इंलैण्ड और जापान के बीच युद्ध चल रहा था और भारत में अंग्रेजी शासन होने के कारण जापान द्वारा भारत पर आक्रमण की आशंका थी। ऐसी स्थिति में भारतीय यह सोचते थे कि यदि अंग्रेज भारत छोड़कर चले जाएँ तो शायद जापान भारत पर आक्रमण न करे। भारत छोड़ो आन्दोलन का कार्यक्रम- आन्दोलन से सम्बन्धित कर्णधारों के गिरफ्तार हो जाने से जनता दिशाहीन होकर असमंजस में पड़ गई। जनता के समक्ष कोई स्पष्ट निर्देश या कार्यक्रम नहीं था। गाँधी जी के केवल कुछ वाक्य थे- ‘करो या मरो’, ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो।’ ऐसी दशा में कांग्रेस के शेष नेताओं की ओर से 12- सूत्री कार्यक्रम प्रकाशित कर दिया गया। इस आन्दोलन के कार्यक्रम के मुख्य आधार निम्नलिखित थे (अ) ‘करो या मरो’ का नारा लगाया गया। |
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